यही इक बात रह-रहकर मिरे दिल को सताती है
    कि आख़िर क्यूँ वो रोया था बिछड़ने से ज़रा पहले
    Muhammad Fuzail Khan
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    वो जब मिलेंगे तो ये बात उन सेे पूछेंगे
    कि मिल के आपसे क्यूँ दुनिया भूल जाते हैं
    Muhammad Fuzail Khan
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    निगाह ए ग़ौर से देखो‌ बड़े मजबूर हैं हम
    उसी के पास में बैठे हैं जिस सेे दूर हैं हम
    Muhammad Fuzail Khan
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    ऐसा खिलता गुलाब क्या भेजें
    जिस की ख़ुशबू न तुम तलक पहुँचे
    Muhammad Fuzail Khan
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    जितना होना था हो चुकी बारिश
    अब तो सब कुछ भिगो चुकी बारिश

    वो जो छोड़ी थीं नांवें बचपन में
    उन को कब का डुबो चुकी बारिश
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    Muhammad Fuzail Khan
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    कुछ घर अंदर से बाहर तक जगमग-जगमग रहते हैं
    कुछ घर के आंगन में केवल एक दीया ही जलता है
    Muhammad Fuzail Khan
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    "हैं जितनी भी किताबें सब"
    हैं जितनी भी किताबें सब
    मेरी इस ज़िंदगानी में

    उन्हीं सारी किताबों की
    मेरी हर इक कहानी में

    जितने हैं सभी क़िस्से
    बहुत ही ख़ास रहते हैं
    मुझे सब याद रहते हैं

    मगर उन सारे क़िस्सों में
    कोई ऐसा भी क़िस्सा है

    जो मेरे सारे क़िस्सों को
    सदा बे-रंग करता है
    मुझे वो तंग करता है

    मुझ को तंग करना बस
    यही इक भेद है उस
    में

    वरक़ के दरमियाँ कोई
    ज़रा सा छेद है उस
    में

    कहानी का वही हिस्सा
    मैं जब भी खोलता हूँ तो

    लिखे हैं हर्फ़ जो उन को
    लबों से बोलता हूँ तो

    बड़े अंदाज़ से वो सब
    इकट्ठा हो तो जाते हैं

    मगर उस छेद से गिरकर
    सभी हर्फ़ खो भी जाते हैं
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    Muhammad Fuzail Khan
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    इस सोच में बैठे कि मिरी सोच का हर पल
    किस सोच में गुज़रा है यही सोच रहा हूँ
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    उदास बैठे हैं सारे रस्ते बहुत दिनों से
    बहुत दिनों से गुज़र तुम्हारा नहीं हुआ है
    Muhammad Fuzail Khan
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    उस ने तोहफ़े में दी हम को इक अधूरी ज़िन्दगी
    हम ने जिस पे वार दी पूरी की पूरी ज़िन्दगी
    Muhammad Fuzail Khan
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