टूट जाता इम्तिहानों से न होकर मुतमइन
    हूँ बुलंदी पे जो मुर्शिद हौसला मिलता रहा
    Saurabh Yadav Kaalikhh
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    बँटे मुल्क मज़हब के ही वास्ते
    बहा ख़ूँ सभी का जो मर कट गया
    Saurabh Yadav Kaalikhh
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    तीरगी थी रास्तों में और भटका मैं बहुत
    रौशनी पाई गुरू से जब कभी गिरता रहा
    Saurabh Yadav Kaalikhh
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    सस्ती मुस्कानें सच्ची हैं
    महॅंगी वाली तो झूठी हैं

    सोना चाँदी पैसा वैसा
    क्यूँँ जेब सभी को भरनी हैं
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    Saurabh Yadav Kaalikhh
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    "एक और साल गुज़र गया"
    एक और साल गुज़र गया
    कोई हँस दिया
    कोई रो लिया
    किसी ने आँसुओं से
    मुँह धो लिया
    एक और साल गुज़र गया

    कोई मंज़िल तक गया
    कोई रहगुज़र में ठहर गया
    कोई अपने घर गया
    कोई पहुँच गया पहाड़
    तो कोई दूर समुंदर गया
    एक और साल गुज़र गया

    कोई ज़िंदगी से लड़ता रहा
    कोई ज़िंदगी से थक गया
    कोई थक कर भी चलता रहा
    और कोई मौत संग रुक गया
    एक और साल गुज़र गया

    किसी ने ज़मीं से आसमाँ देखा
    किसी ने आसमाँ से ज़मीं
    कोई ख़ुशी ख़ुशी रहा
    कुछ को नसीब हुई नमी
    ज़िंदगी है
    कभी अच्छा कभी बुरा पहर गया
    एक और साल गुज़र गया
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    Saurabh Yadav Kaalikhh
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    मेरी ज़िंदगी में ख़ुशी का ठिकाना नहीं है
    यहाँ मैं किसी का नहीं कोई मेरा नहीं है
    Saurabh Yadav Kaalikhh
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    सब सीमित है
    यहाँ कोई रिक्त नहीं है
    सिवाए लाल कोई रक्त नहीं है
    किसी के पास है थोड़ा ज़्यादा
    तो कोई बिस्तर पर पड़े सोचता कि
    वक़्त कम है या वक़्त ही नहीं है

    सब सीमित है
    सीमित ज़मीं है सीमित है ये खुला आसमान
    सीमित इस आसमान तले रह रहे हम इंसान
    सीमित है आप का मकान भी
    सीमित आप की मौत का सामान भी

    सीमित है धड़कन की रफ़्तार भी
    ये दहर भी ये दयार भी
    सीमित हैं यहाँ यार भी
    यारों की बातें मुलाक़ातें
    दिन का वक़्त हो या ये रातें

    सीमित हैं ग़म यहाँ
    ग़म के बा'द की ख़ुशी
    सीमित सी है रस्सी
    और उस
    में पड़ने वाली गाँठ
    लोगों के अपने नवाबी ठाठ

    सीमित रिश्ते हैं
    नहीं दिखते फ़रिश्ते हैं
    सीमित आप के घर गाड़ी
    मोबाइल की किश्तें हैं
    जिन्हें भरने के लिए
    आप अपने सीमित जीवन में
    सीमित कमाई के लिए
    सीमित संख्या में काम करते हैं

    सीमित है आप का वक़्त भी
    सीमित हैं ज़िंदगी के पड़ाव
    हर पड़ाव के दरख़्त भी

    सीमित है आप की जवानी जिस्म में रवानी
    ये सारी हवा ये पानी हमारी तुम्हारी वाणी

    सूरज का उगना डूबना सीमित है
    डूबता सूरज देख समझ आया
    उजाला सीमित है
    और उगता सूरज देख समझ आया
    कि अँधेरे से सीमित रिश्ता ही
    स्थिरता की राह है
    स्थिरता सीमित है
    सीमित है राह भी
    ख़ुद की परवाह भी

    सीमित उम्र है
    निश्चित मृत्यु है
    सीमित है आप की काठी
    सीमित है लकड़ी लाठी
    सीमित है आप के ताबूत का वज़न
    सीमित है आप के ऊपर पहनाया गया कफ़न
    आप के लिए तय हुई दो गज़ भर ज़मीन
    आप के नीचे बिछी आख़िरी कालीन
    सीमित है

    सीमित शब्दों से जितना लिख पाए लिखते गए
    मुँह उठा कर कहीं से कालिख़ आए पढ़ते गए
    जितना पढ़ पाए
    क्योंकि वक़्त बेहद सीमित था
    सीमित है सीमित रहेगा
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    Saurabh Yadav Kaalikhh
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    उम्र भर वो दूसरों की ही बनाता था छतें
    ऐ ख़ुदा मज़दूर की दीवार पक्की क्यूँँ नहीं
    Saurabh Yadav Kaalikhh
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    बस इतना सा ख़ुद में मैं पूरा हो जाऊँ
    थोड़ा दरख़्त थोड़ा सा दरिया हो जाऊँ
    Saurabh Yadav Kaalikhh
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    कुछ इस क़दर बे-यार हैं हम
    अब हर किसी के यार हैं हम
    Saurabh Yadav Kaalikhh
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