Ammar 'yasir'

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    माँ तुझ को बताता तो नहीं हूँ
    पर तुझ को पता है ना मेरा प्यार
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    पहले क्यूँ इतनी सारी मेहनत करते हो
    और फिर यूँँ हाए मेरी क़िस्मत करते हो

    शायद फिर मिल न पाओ उस से तुम यासिर
    कह दो उस को उसे मोहब्बत करते हो
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    Ammar 'yasir'
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    इतना प्यार में शर्मिंदा हुआ है
    अब तू शर्म से मर क्यूँ नहीं जाता
    Ammar 'yasir'
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    काश तू इस से पहले मर जाता 'यासिर'
    उस की मेहंदी पे नाम है और किसी का
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    मैं प्यार हूँ न तेरा चलो दूसरा सही
    दे मुझ को तू वफ़ा तेरी तू बे वफ़ा सही

    तेरा ये लहजा मुझ को हमेशा रुलाता है
    तू एक बार मुझ को गले तो लगा सही

    शायद मैं उस के जैसा कभी भी न बन सकूँ
    लेकिन हाँ उस के ज़ख़्म की कोई दवा सही

    मेरा घमंड था ये कि तुझ को न मानना
    अब ये कोई सज़ा है तेरी तो सज़ा सही

    हर एक लफ़्ज़ तेरे लिए होता है मेरा
    अब ये कोई दुआ है तेरी तो दुआ सही
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    Ammar 'yasir'
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    मैं ने माना वो मेरा कुछ भी नहीं
    हाँ मगर इस में बुरा कुछ भी नहीं

    मेरे आगे से वो कुछ ऐसे गया
    मैं तो जैसे उस का था कुछ भी नहीं

    उस पे सब अपना लुटा कर और फिर
    मुझ को बदले में मिला कुछ भी नहीं

    रात भर को जागने के बा'द मैं
    यूँँ उठा जैसे हुआ कुछ भी नहीं

    देख मुझ को तेरे आगे बैठा हूँ
    तुझ से जानाँ अब छुपा कुछ भी नहीं

    जिस को चाहूँ छोड़ जाता है मुझे
    इस में अब 'यासिर' नया कुछ भी नहीं
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    तू नए किसी दर क्यूँ नहीं जाता
    तेरा ख़्वाब बिखर क्यूँ नहीं जाता

    इतना प्यार में शर्मिंदा हुआ है
    अब तू शर्म से मर क्यूँ नहीं जाता

    उस की याद में क्यूँ ऐसे रहूँ मैं
    ज़ख़्म उस का ये भर क्यूँ नहीं जाता

    बार बार वो इक ही गली जाना
    तू अभी भी सुधर क्यूँ नहीं जाता

    कैसे उस की किसी याद से निकलूँ
    उस का मुझ से असर क्यूँ नहीं जाता

    कैसी इक बुरी नागिन थी वो हाए
    ज़हर उस का उतर क्यूँ नहीं जाता

    ईद को अभी यासिर है समय कुछ
    छत से चाँद मगर क्यूँ नहीं जाता
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    एक ज़ख़्म जिस की अब दुआ नहीं
    तेरे जैसा कोई भी मिला नहीं

    दूरियों के बावजूद ख़ुश हूँ मैं
    अब किसी से कोई भी गिला नहीं
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    अब नहीं है याद उस को नाम हमारा
    करता था दिल से जो एहतिराम हमारा
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    उस की आँखों में पिघल जाते हैं
    हर शब आवारा निकल जाते हैं
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