मेरी आँखों की नमी पर बात की है
    लगता है तेरी कमी पर बात की है

    ख़ूब-सूरत सोच है लड़की तुम्हारी
    तुम ने तो हर आदमी पर बात की है
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    Neeraj Nainkwal
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    तीरगी जैसे निकलती है दिए की रौशनी से
    एक दिन मैं भी चला जाऊँगा तेरी ज़िंदगी से
    Neeraj Nainkwal
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    इक मुहब्बत से भरी उस ज़िंदगी के ख़्वाब हैं
    पेड़ दरिया और पंछी तेरे मेरे ख़्वाब हैं
    Neeraj Nainkwal
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    हर गली, हर गाँव ये तो शहर भर का मसअला है
    काम धंधा रोज़ी रोटी आम घर का मसअला है
    Neeraj Nainkwal
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    जहाँ पर तीरगी है रौशनी करना
    ख़ुदा सबके मुक़द्दर में ख़ुशी करना

    मिरे बच्चों मिरी बस एक ख़्वाहिश है
    बड़े होकर के तुम भी शा'इरी करना
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    Neeraj Nainkwal
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    मेरी इक शर्त है तू निभा के दिखा
    ज़िंदगी है अकेले बिता के दिखा

    जंग से पहले ही हार जाऊँगा मैं
    यार इक बार नज़रें उठा के दिखा
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    Neeraj Nainkwal
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    इस लिए ख़ुद-कुशी नहीं करते
    बा'द तेरी ख़ुशी का क्या होगा
    Neeraj Nainkwal
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    काग़ज़ में कविता बनकर रह जाएगी
    ये इक लड़की बाहों में रहने वाली
    Neeraj Nainkwal
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    इस ज़िंदगी ने मत पूछो कितना हैरान किया
    कांटो का साथ मिला फूलों ने परेशान किया
    Neeraj Nainkwal
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    मेरा किसी से कोई भी रिश्ता नहीं
    मतलब जो भी मेरा है वो मेरा नहीं

    ये ख़ुशियाँ आख़िर में तो ग़म ही देती हैं
    टेबल पे वो कांटा है गुलदस्ता नहीं

    कैसे हो पाए उन के घर बरकत भला
    जिन के भी घर में कोई इक बिटिया नहीं

    उस ने कहा तुम कौन लगते हो मिरे?
    और मैं था जो इस बात को समझा नहीं

    मुझ सेे जुदा होना भी मर्ज़ी है तिरी
    ये रोना मेरा है तिरा रोना नहीं

    घर से निकाला जैसे माँ और बाप को
    माँ कहती है तू तो मिरा बेटा नहीं

    मेरी कही गज़लें ये सब वो बातें हैं
    जिन बातों को तुम ने कभी सुनना नहीं

    लौकी की सब्जी कितनी अच्छी लगती है
    ये बीवी का डर है तिरा कहना नहीं

    वो मेरे हँसने को ख़ुशी कह देता है
    हाँ है वो सच्चा, फिर भी वो सच्चा नहीं

    इस ईद पर सब दोस्तों ने मिलना है
    और बक्से में इक भी नया कुर्ता नहीं

    जन्नत तलाशी उस ने मस्जिद में बहुत
    इक बार उस ने माँ को पर देखा नहीं

    वो लोग जिन के चार-सू है रौशनी
    और उन की चौखट पे कोई दीया नहीं

    इक दिन ये कहना तुम अजी सुनते हो क्या?
    ये सिर्फ़ तेरा हक़ है और सबका नहीं

    वो कल मिरा घर देखने आएगी और
    रहने को मेरे पास इक कमरा नहीं

    दौलत है और ये शोहरत फिर भी मैं एक
    निर्धन रहा जो पास मेरी माँ नहीं

    सब रोना रो देते हैं सबके सामने
    रोना ये है रोना कभी दिखता नहीं

    मेरी पतंगो ने हमेशा कटना है
    इक डोर काटे मेरा वो धागा नहीं

    तेरे जुदा होने पर अब ये हाल है
    कोई ख़ुशी हो चाहे मैं हँसता नहीं

    नीरज भले शरबत बनाओ कितने भी
    उस ने यही कहना है ये मीठा नहीं
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    Neeraj Nainkwal
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