Parvez Zaami

Top 10 of Parvez Zaami

    मैं तो मुश्ताक़ हूँ उस दिन का अज़ल से 'ज़ामी'
    कब बपा हश्र हो कब उन का मैं जल्वा देखूँ
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    जानाँ अफ़सोस मेरी मय्यत पर
    थोड़ा सा तो जता दिया होता
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    दुनिया कितनी ही ख़ूब-सूरत हो
    आप बाहम नहीं तो कुछ भी नहीं
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    मुस्कुरा के तू गर पिलाए तो
    एक क़तरा फ़ुरात है साक़ी
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    महताब तेरे रुख़ की ज़ियारत का नाम है
    सिंदूर तेरी माँग का उल्फ़त का नाम है

    तकलीफ़ दे रही है मुझे बे-रुख़ी तिरी
    नज़रें चुराना तेरा अज़िय्यत का नाम है

    वल्लाह पास कुछ भी नहीं ख़ार के सिवा
    जो आप माँगते हैं वो निकहत का नाम है

    कहते हैं लोग जिस को सनम बादा-ए-इरम
    वो तो तिरे लबों की हलावत का नाम है

    मुरझा गए हैं फूल याँ अहद-ए-बहार में
    कश्मीर की सुना था ये जन्नत का नाम है

    पूछेगा मुझ से गर कोई बारे में इश्क़ के
    कह दूँगा साफ़-साफ़ मुसीबत का नाम है

    तुम से ये किस ने कह दिया फुर्क़त-ज़दा हूँ मैं
    'ज़ामी' तो मेरी जान मसर्रत का नाम है
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    जब तलक सूरज को ग्रहण लगे 'ज़ामी'
    चाँद का क़िस्सा सुनाओ अँधेरा है
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    चश्म-ए-बद-बीन से न देख हमें
    यार उल्फ़त-शिआर हैं हम लोग
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    अपने खूँ से चमन को सींचा है
    फिर भी बे-एतिबार हैं हम लोग
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    मुरझा गए हैं फूल याँ अहद-ए-बहार में
    कश्मीर की सुना था ये जन्नत का नाम है
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    शमीम-ए-हैदर अली क़लंदर
    तू बंदा पर्वर अली क़लंदर

    सवाली जाते हैं झोली भर कर
    करम का मेहवर अली क़लंदर

    न औरों के दर से माँगते हैं
    तिरे गदागर अली क़लंदर

    वफ़ा-शिआरी तुझी से सीखी
    वफ़ा का पैकर अली क़लंदर

    पियासे आए हैं तिरे दर पर
    पिलाओ कौसर अली क़लंदर

    ये शान तेरी के तू ने पाई
    वसी-मोअत्तर अली क़लंदर

    बदल दे 'ज़ामी' का तू मुक़द्दर
    निगाह-ए-मेहर अली क़लंदर
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