Rehan Mirza

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    ये नहीं कहता मुहब्बत हो रही है
    मुझ को लेकिन तेरी आदत हो रही है

    तेरे दरियाओं पे ला'नत हो रही है
    दश्त में प्यासों की इज़्ज़त हो रही है

    ख़ूब-सूरत लोग मारे जा रहे हैं
    दुनिया कितनी बे-मुरव्वत हो रही है

    दिन ब दिन मैं शे'र अच्छे कह रहा हूँ
    दिन ब दिन तू ख़ूब-सूरत हो रही है

    रंग भी अब तेरे मेरे हो गए हैं
    फूलों पर जम कर सियासत हो रही है

    लब उदासी के सबब सूखे हुए हैं
    मुस्कराने में अज़ीयत हो रही है
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    था साथ उस के और मैं कितना उदास था
    सूखा वही दरख़्त जो दरिया के पास था
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    फूल पे बैठी तितली अच्छी लगती है
    हँसती खेलती लड़की अच्छी लगती है

    तुम पर ऐसी कड़वी बातें नइँ जचतीं
    चाय हमेशा मीठी अच्छी लगती है

    ख़ामोशी से ग़ुस्सा बेहतर होता है
    सर्दी में तो धूप भी अच्छी लगती है

    सब की नज़रें उस पर ही क्यूँँ होती हैं
    मुझ को जो भी लड़की अच्छी लगती है

    वरना मैं ऊँची आवाज़ नहीं सुनता
    तू जो दे तो गाली अच्छी लगती है

    जी करता है चूम लूँ उस के गालों को
    इतनी, इतनी, इतनी, अच्छी लगती है

    वो मुझ को अच्छी लगती है, बोला ना
    ये मत पूछो कितनी अच्छी लगती है
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    एक ही शख़्स नहीं होता सदा दिल का सुकूँ
    एक करवट पे कभी नींद नहीं आ सकती
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    छत की फ़सील पर से ये बच्चा उतर गया
    दिल से तुम्हारे इश्क़ का नश्शा उतर गया

    मेरी तरफ़ चला था जो तिरछी निगाह से
    वो तीर मेरे सीने में सीधा उतर गया

    आँखों पे उस ने एक दफ़ा हाथ क्या रखे
    मुझ को लगा हुआ था जो चश्मा उतर गया

    मेरे बग़ैर तू ने गुज़ारी है ज़िन्दगी
    कैसे तेरे गले से ये लुक़मा उतर गया

    निय्यत से डाँटने की ही मैं तो गया था पर
    मुस्कान उस की देख के ग़ुस्सा उतर गया

    वो आज मुझ को देख के क्या मुस्करा दिए
    महफ़िल में एक-एक का चेहरा उतर गया
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    हम थक चुके थे आप के झूठे जहान में
    तो सो रहे हैं चैन से अपने मकान में

    मुरझाए से जो रहते थे शादाब हो गए
    तितली ने जाने क्या कहा फूलों के कान में

    जूही, गुलाब, चम्पा, चमेली भी है मगर
    रुतबा तुम्हारा ऊँचा है इस ख़ानदान में

    कोई सुख़न-शनास इन्हें भी ख़रीद ले
    कुछ शे'र टाँग रक्खे हैं अपनी दुकान में

    अपने हसीं लबों से वो यूँँ बोलता है झूठ
    जैसे कि ज़हर दे रहा हो मीठे पान में

    लहजे में इन के वैसी महक आती ही नहीं
    ये फूल लाख बोल लें तेरी ज़बान में
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    ख़िज़ाँ को आता है कैसे बहार कर लेना
    लहू के छींटो से काँटो को प्यार कर लेना

    वो जो भी कह रहा है सच ही कह रहा होगा
    हमारा काम है बस ऐतिबार कर लेना
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    वो लड़की चाहती है उड़ना अपनी मर्ज़ी से
    उसे पतंग नहीं इक परिंदा बनना है
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    शे'र कहने का सलीक़ा तो नहीं आता हमें
    हम तो बस दर्द को लफ़्ज़ों में पिरो देते हैं
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    लटक चुका था मैं तुम से बिछड़ के पँखे पर
    उठाया आ के मुझे शा'इरी ने काँधे पर

    कभी जो पूरे के पूरे चमन का मालिक था
    उसी ने कर लिया समझौता एक गमले पर

    ये राह-ए-इश्क़ ज़रा भी सहल नहीं होती
    मैं चल रहा हूँ बहुत ही महीन धागे पर

    यहाँ जो रहना है चेहरे बदलना सीखो फिर
    यहाँ गुज़ारा नहीं होगा एक चेहरे पर

    तमाम उम्र वो शीशों से दूर भागेगा
    हमारा ख़ून लगा देना जज के माथे पर

    सहारा उस को बुढ़ापे में बेटी ने बख़्शा
    ग़ुरूर था जिसे अपने जवान बेटे पर
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    Rehan Mirza
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