सिम्पल भोली भाली लड़की, हाए रे
    दोस्त के जैसी प्यारी लड़की, हाए रे

    एक शराबी बुत से माँगे व्हिस्की और
    व्हिस्की पीने वाली लड़की, हाए रे

    ये तो बिल्कुल सपने जैसी बात हुई
    जैसा सोचा वैसी लड़की, हाए रे

    बात मुसलसल करता रहता हूँ उस सेे
    मेरे यारों जैसी लड़की, हाए रे

    पतली खम्बे जैसी लड़की से तौबा
    लंबी चौड़ी भारी लड़की, हाए रे
    Read Full
    Asad Akbarabadi
    2 Likes
    क़तरे भी गिरे आँख से पारा भी बहुत था
    वो शख़्स मुझे जान से प्यारा भी बहुत था

    यूँँ छोड़ के जाने की ज़रूरत तो नहीं थी
    दिल तोड़ने को एक इशारा भी बहुत था

    चुप-चाप ज़ुबांँ से मेरी शिकवा है तुम्हें क्यूँ
    रो रो के निगाहों ने पुकारा भी बहुत था

    पलकों पे सजाए थे कई मीठे से सपने
    जो ख़्वाब गिरा आँख से ख़ारा भी बहुत था

    उस को बिठा के साथ में इतना न उड़ो तुम
    जो आज तुम्हारा है हमारा भी बहुत था

    जो हो गया सो ठीक है ज़िद छ़ोड़ 'असद' अब
    जाने दे उसे उस का ख़सारा भी बहुत था
    Read Full
    Asad Akbarabadi
    3 Likes
    किसी को ज़िंदगी देकर कभी भी मार देता है
    कहानी कार भी कोई ख़ुदा से कम नहीं होता
    Asad Akbarabadi
    1 Like
    महकते इत्र के मानिंद है ये इश्क़ जाने मन
    भले पर्दे में भी निकलोगी तो पहचान ही लेंगे
    Asad Akbarabadi
    0 Likes
    इल्म-दाँ हो रिंद हो या बावरा क्या देखना
    चारा-गर तू घाव भर किस का भरा क्या देखना

    ज्ञान देते उन अमीरों से वो कासा बोल उठा
    भूख में रोटी दिखा सोना ख़रा क्या देखना

    ताज पर जब चाँदनी बरसे तो जन्नत सा लगे
    बात यूँँ तो ठीक है पर मक़बरा क्या देखना

    अल्मिया हो सानेहा हो या कोई धोखाधड़ी
    सर पटक कर एक दीवाना मरा क्या देखना

    मशवरे फिर मशवरे फिर मशवरे लेते रहे
    क्या बचा इस
    में तुम्हारा मशवरा क्या देखना

    मीरो-ग़ालिब के हवाले से हुई है शा'इरी
    लखनऊ दिल्ली है कहती आगरा क्या देखना

    तीन रंगों को बराबर का दिया दर्जा 'असद'
    कितना केसरिया है कितना है हरा क्या देखना
    Read Full
    Asad Akbarabadi
    0 Likes
    नज़रें हो गड़ीं जिन की वसीयत पे दिनो-रात
    माँ-बाप कि 'उम्रों कि दुआ ख़ाक करेंगे
    Asad Akbarabadi
    13 Likes
    ज़माने से मिली शोहरत ज़माने तक ही सीमित है
    हम अपना कद हमारे दोस्त से ऊँचा नहीं रखते
    Asad Akbarabadi
    2 Likes
    बा-वज़ू पुर-फ़िदाक दिल अपना
    हम चले कर के पाक दिल अपना

    सोचता है कि ज़ीस्त तर्क करे
    क्या करे कर्ब-नाक दिल अपना

    दिल लगाने को चाहिए इक दिल
    कैसे लग जाए ख़ाक-दिल अपना

    खा रही है मलूलियत हम को
    हो गया है ख़ुराक-दिल अपना

    वो भी सूरत ही देखती होगी
    यूँँ तो है ठीक ठाक दिल अपना

    ख़ूब-रू जब पलट गई तौबा
    हम ने थामा तपाक दिल अपना

    यूँँ तो रखता है ज़ौक़े-मर्ग असद
    फिर भी सीता है चाक-दिल अपना
    Read Full
    Asad Akbarabadi
    0 Likes
    ये कैसा लक़ब है कहाँ तू कहाँ मैं
    बड़ा बे-सबब है, कहाँ तू कहाँ मैं

    मैं गुम-सुम तो हूँ दोस्त तुझ सेे बिछड़ कर
    तुझे ये तरब है कहाँ तू कहाँ मैं

    ये चीज़ें सिखाता नहीं शख़्स कोई
    ये उन का नसब है कहाँ तू कहाँ मैं

    ये पहले से तय था जहाँ मैं वहाँ तू
    मगर हाल अब है कहाँ तू कहाँ मैं

    यूँँ छुप छुप के मिलना है बेकार कोशिश
    ख़बर सब को सब है कहाँ तू कहाँ मैं


    'असद' चाहे जितना तू कर ले बराबर

    ये दुनिया का ढब है कहाँ तू कहाँ मैं
    Read Full
    Asad Akbarabadi
    1 Like
    दो नावों पर पाँव पसारे ऐसे कैसे
    वो भी प्यारा हम भी प्यारे ऐसे कैसे

    सूरज बोला बिन मेरे दुनिया अंधी है
    हँस कर बोले चाँद सितारे ऐसे कैसे

    तेरे हिस्से की ख़ुशियों से बैर नहीं पर
    मेरे हक़ में सिर्फ़ ख़सारे ऐसे कैसे

    गालों पर बोसा दे कर जब चली गई वो
    कहते रह गए होंठ बिचारे ऐसे कैसे

    मुझ जैसों को यां पर देख के कहते हैं वो
    इतना आगे बिना सहारे ऐसे कैसे

    जैसे ही मक़्ते पर पहुँची ग़ज़ल असद की
    बोल उठे सारे के सारे ऐसे कैसे
    Read Full
    Asad Akbarabadi
    28 Likes

Top 10 of Similar Writers