Adarsh Akshar

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    दुनिया कहती थी सरफिरा लड़का
    फिर भी तुम पर था मर मिटा लड़का

    तजरबे बांटता था सब सेे ही
    देता था सब को मशवरा लड़का
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    मेरे हिस्से का आसमाँ दे दो
    ख़ामियाँ ले लो ख़ूबियाँ दे दो

    प्यार में सब को फ़ेल होना है
    जितने भी चाहे इम्तिहाँ दे दो
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    क्या रखा है ज़िंदगी में
    वक़्त की इस बे-रुख़ी में

    आप का ही ज़िक्र करते
    आज-कल हम शा'इरी में

    रौशनी में खो गए जो
    वो मिले फिर तीरगी में

    फ़र्क़ ज़्यादा है नहीं कुछ
    दोस्ती में दुश्मनी में

    तजरबा है कह रहा हूँ
    दुख बहुत हैं आशिक़ी में
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    तीरगी है रौशनी है
    ख़ूब-सूरत ज़िन्दगी है

    कुछ नहीं है पास मेरे
    बस ज़रा दीवानगी है

    कल तलक़ तो यार थे पर
    आज उन सेे दुश्मनी है

    आँख उस की देख लूँ तो
    ख़ुद निकलती शा'इरी है

    हो सके तो प्यार बाँटो
    साँस केवल दो घड़ी है
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    क़दमों में उस के दुनिया है
    लेकिन फिर भी वो तन्हा है

    बंदा चाहे जैसा भी हो
    ग़ज़लें तो अच्छी कहता है

    हासिल उतना ही होता बस
    किस्मत में जितना लिक्खा है

    मैं बिल्कुल उस के जैसा हूँ
    वो बिल्कुल मेरे जैसा है

    उस के हिस्से में खिड़की है
    मेरे हिस्से दरवाज़ा है
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    कतरे से दरिया बनता है
    मिल कर ही रिश्ता बनता है

    ख़ून पसीना इक करने से
    मंज़िल तक रस्ता बनता है
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    उपवन की इक तितली है वो
    कितनी सुंदर लड़की है वो

    उन के सुध-बुध खो जाते हैं
    जिन से मिलती जुलती है वो

    दुनिया की सुनती है लेकिन
    अपने दिल की करती है वो

    बातों से घाइल करती है
    शायद ग़ज़लें पढ़ती है वो

    कोशिश की समझाने की पर
    अपनी धुन में रहती है वो
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    Adarsh Akshar
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    ग़ज़लें नज़्में दोहा लिक्खा है
    तेरे ख़ातिर क्या क्या लिक्खा है
    Adarsh Akshar
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    जीने की मारा मारी क्यूँ है
    सब को इक ही बीमारी क्यूँ है

    जिस ने देखा उन सबने पूछा
    ये लड़की इतनी प्यारी क्यूँ है
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    Adarsh Akshar
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    पहले बाहरस फिर अंदर टूट गया
    सीने से लग कर के ख़ंजर टूट गया

    यूँँ बे-मतलब अपनों से लड़ते लड़ते
    मेरे भीतर एक सिकंदर टूट गया
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    Adarsh Akshar
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