Adesh Rathore

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    आ गया इश्क़ का घटाना बस
    अब नहीं कुछ भी आज़माना बस

    तुम नहीं आए मेरी ग़लती है
    हम को आता नहीं बुलाना बस

    तुम ने जो बोला हम ने मान लिया
    वो हक़ीक़त हो या फ़साना बस

    तुम ने भी हाँ यही तो सीखा है
    अच्छे रिश्तों को काट खाना बस

    सिर्फ़ अच्छे दिनों के साथी हो
    तुम ख़ुशी और ये ज़माना बस
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    वैसे तो दर-ब-दर नहीं हूँ मैं
    इतना भी बे-असर नहीं हूँ मैं

    सोचता हूँ तुझे तो लगता है
    क्यूँ तेरा हम सफ़र नहीं हूँ मैं
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    हमें भी गर सहूलत ख़ुद-कुशी की दे अगर मौला
    तो हम भी ज़िन्दगी के जाल से आज़ाद हो जाऍं
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    ज़रूरी है हमें मिलती रहे छाया बुज़ुर्गों की
    नलों के पास ये फुलवार याँ बेहद ज़रूरी है
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    वैसे तो लोग आते जाते हैं
    पर तिरे जैसे दिल को भाते हैं

    हम ग़ज़ल फिर कभी बना लेंगे
    चल तेरा बर्थडे मनाते हैं
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    इश्क़ पर आँच आने मत देना
    छोड़ जाऊॅं तो ता'ने मत देना

    जाने वालों ने ही सिखाया है
    आने वालों को आने मत देना

    मेरे अंदर से है सदा आती
    उस को ऐसे ही जाने मत देना

    दिल न तुझ सेे अगर लगाए वो
    किसी से भी लगाने मत देना

    बात करना गले लगाना पर
    दिल किसी को फ़लाने मत देना
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    सुनो ख़ाली मकानों में मेरा भी मन नहीं लगता
    हक़ीक़त में फ़सानों में मेरा भी मन नहीं लगता

    तुम्हें यूँॅं भूल जाने में बहुत मुश्किल तो आएगी
    मगर आसान कामों में मेरा भी मन नहीं लगता

    ज़मीं से इश्क़ था सो हम फ़लक छू कर के लौट आए
    तेरे बिन आसमानों में मेरा भी मन नहीं लगता

    मैं अपने गाॅंव की मिट्टी की ख़ुशबू का दिवाना हूँ
    नगर के कारखानों में मिरा भी मन नहीं लगता

    अगर मन हो तो सुन लेता हूँ मैं तहज़ीब की गजलें
    कभी लेटेस्ट गानों में मेरा भी मन नहीं लगता
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    इक ज़माना है जो बेकार समझता है मुझे
    और इक तू जो तेरा यार समझता है मुझे

    है ये लाज़िम कि तू भोला है तो भोला समझे
    वरना हर शख़्स तो हुशियार समझता है मुझे

    एक मैं हूँ कि वफ़ा लफ़्ज़ से वाक़िफ़ नहीं हूँ
    एक तू है कि वफ़ादार समझता है मुझे

    जाने कितनों की हूँ ख़्वाहिश जिन्हें हासिल नहीं मैं
    जिस को हासिल हूँ वो इतवार समझता है मुझे
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    छुअन क़िस्मतों में नहीं हूँ मैं गेसू
    नसीबों में बोसे नहीं गाल हूँ मैं
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    परतंत्रता के घाव से आज़ाद कर दिया
    लोगों को हर तनाव से आज़ाद कर दिया

    इक आदमी हुआ कि जिस की इक किताब ने
    भारत को भेदभाव से आज़ाद कर दिया
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