इश्क़ के इज़हार में हर-चंद रुस्वाई तो है
    पर करूँँ क्या अब तबीअत आप पर आई तो है
    Akbar Allahabadi
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    आँखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते
    अरमान मिरे दिल के निकलने नहीं देते

    ख़ातिर से तिरी याद को टलने नहीं देते
    सच है कि हमीं दिल को सँभलने नहीं देते

    किस नाज़ से कहते हैं वो झुँझला के शब-ए-वस्ल
    तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते

    परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले
    क्यूँँ हम को जलाते हो कि जलने नहीं देते

    हैरान हूँ किस तरह करूँँ अर्ज़-ए-तमन्ना
    दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते

    दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त
    हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते

    गर्मी-ए-मोहब्बत में वो हैं आह से माने'
    पंखा नफ़स-ए-सर्द का झलने नहीं देते
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    Akbar Allahabadi
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    दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ
    बाज़ार से गुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ

    ज़िंदा हूँ मगर ज़ीस्त की लज़्ज़त नहीं बाक़ी
    हर-चंद कि हूँ होश में हुश्यार नहीं हूँ

    इस ख़ाना-ए-हस्ती से गुज़र जाऊँगा बे-लौस
    साया हूँ फ़क़त नक़्श-ब-दीवार नहीं हूँ

    अफ़्सुर्दा हूँ इबरत से दवा की नहीं हाजत
    ग़म का मुझे ये ज़ोफ़ है बीमार नहीं हूँ

    वो गुल हूँ ख़िज़ाँ ने जिसे बर्बाद किया है
    उलझूँ किसी दामन से मैं वो ख़ार नहीं हूँ

    या रब मुझे महफ़ूज़ रख उस बुत के सितम से
    मैं उस की इनायत का तलबगार नहीं हूँ

    गो दावा-ए-तक़्वा नहीं दरगाह-ए-ख़ुदा में
    बुत जिस से हों ख़ुश ऐसा गुनहगार नहीं हूँ

    अफ़्सुर्दगी ओ ज़ोफ़ की कुछ हद नहीं 'अकबर'
    काफ़िर के मुक़ाबिल में भी दीं-दार नहीं हूँ
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    Akbar Allahabadi
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    फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं
    डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं

    मा'रिफ़त ख़ालिक़ की आलम में बहुत दुश्वार है
    शहर-ए-तन में जब कि ख़ुद अपना पता मिलता नहीं

    ग़ाफ़िलों के लुत्फ़ को काफ़ी है दुनियावी ख़ुशी
    आक़िलों को बे-ग़म-ए-उक़्बा मज़ा मिलता नहीं

    कश्ती-ए-दिल की इलाही बहर-ए-हस्ती में हो ख़ैर
    नाख़ुदा मिलते हैं लेकिन बा-ख़ुदा मिलता नहीं

    ग़ाफ़िलों को क्या सुनाऊँ दास्तान-ए-इश्क़-ए-यार
    सुनने वाले मिलते हैं दर्द-आश्ना मिलता नहीं

    ज़िंदगानी का मज़ा मिलता था जिन की बज़्म में
    उन की क़ब्रों का भी अब मुझ को पता मिलता नहीं

    सिर्फ़ ज़ाहिर हो गया सरमाया-ए-ज़ेब-ओ-सफ़ा
    क्या तअज्जुब है जो बातिन बा-सफ़ा मिलता नहीं

    पुख़्ता तबओं पर हवादिस का नहीं होता असर
    कोहसारों में निशान-ए-नक़्श-ए-पा मिलता नहीं

    शैख़-साहिब बरहमन से लाख बरतें दोस्ती
    बे-भजन गाए तो मंदिर से टिका मिलता नहीं

    जिस पे दिल आया है वो शीरीं-अदा मिलता नहीं
    ज़िंदगी है तल्ख़ जीने का मज़ा मिलता नहीं

    लोग कहते हैं कि बद-नामी से बचना चाहिए
    कह दो बे उस के जवानी का मज़ा मिलता नहीं

    अहल-ए-ज़ाहिर जिस क़दर चाहें करें बहस-ओ-जिदाल
    मैं ये समझा हूँ ख़ुदी में तो ख़ुदा मिलता नहीं

    चल बसे वो दिन कि यारों से भरी थी अंजुमन
    हाए अफ़्सोस आज सूरत-आश्ना मिलता नहीं

    मंज़िल-ए-इश्क़-ओ-तवक्कुल मंज़िल-ए-एज़ाज़ है
    शाह सब बस्ते हैं याँ कोई गदा मिलता नहीं

    बार तकलीफ़ों का मुझ पर बार-ए-एहसाँ से है सहल
    शुक्र की जा है अगर हाजत-रवा मिलता नहीं

    चाँदनी रातें बहार अपनी दिखाती हैं तो क्या
    बे तिरे मुझ को तो लुत्फ़ ऐ मह-लक़ा मिलता नहीं

    मा'नी-ए-दिल का करे इज़हार 'अकबर' किस तरह
    लफ़्ज़ मौज़ूँ बहर-ए-कश्फ़-ए-मुद्दआ मिलता नहीं
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    Akbar Allahabadi
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    आँखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते
    अरमान मिरे दिल के निकलने नहीं देते

    ख़ातिर से तिरी याद को टलने नहीं देते
    सच है कि हमीं दिल को सँभलने नहीं देते

    किस नाज़ से कहते हैं वो झुँझला के शब-ए-वस्ल
    तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते

    परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले
    क्यूँँ हम को जलाते हो कि जलने नहीं देते

    हैरान हूँ किस तरह करूँँ अर्ज़-ए-तमन्ना
    दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते

    दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त
    हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते

    गर्मी-ए-मोहब्बत में वो हैं आह से माने'
    पंखा नफ़स-ए-सर्द का झलने नहीं देते
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    Akbar Allahabadi
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    हंगामा है क्यूँँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है
    डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है

    ना-तजरबा-कारी से वाइ'ज़ की ये हैं बातें
    इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है

    उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना
    मक़्सूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है

    ऐ शौक़ वही मय पी ऐ होश ज़रा सो जा
    मेहमान-ए-नज़र इस दम एक बर्क़-ए-तजल्ली है

    वाँ दिल में कि सद
    में दो याँ जी में कि सब सह लो
    उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है

    हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से
    हर साँस ये कहती है हम हैं तो ख़ुदा भी है

    सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत के करिश्में हैं
    बुत हम को कहें काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है

    ता'लीम का शोर ऐसा तहज़ीब का ग़ुल इतना
    बरकत जो नहीं होती निय्यत की ख़राबी है

    सच कहते हैं शैख़ 'अकबर' है ताअत-ए-हक़ लाज़िम
    हाँ तर्क-ए-मय-ओ-शाहिद ये उन की बुज़ुर्गी है
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    Akbar Allahabadi
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    हम ऐसी कुल किताबें क़ाबिल-ए-ज़ब्ती समझते हैं
    कि जिन को पढ़ के लड़के बाप को ख़ब्ती समझते हैं
    Akbar Allahabadi
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    पैदा हुआ वकील तो शैतान ने कहा
    लो आज हम भी साहिब-ए-औलाद हो गए
    Akbar Allahabadi
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    हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
    वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता
    Akbar Allahabadi
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    इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद
    अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता
    Akbar Allahabadi
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