उठो हिन्द के बाग़बानो उठो
    उठो इंक़िलाबी जवानो उठो
    किसानों उठो काम-गारो उठो
    नई ज़िंदगी के शरारो उठो
    उठो खेलते अपनी ज़ंजीर से
    उठो ख़ाक-ए-बंगाल-ओ-कश्मीर से
    उठो वादी ओ दश्त ओ कोहसार से
    उठो सिंध ओ पंजाब ओ मल्बार से
    उठो मालवे और मेवात से
    महाराष्ट्र और गुजरात से
    अवध के चमन से चहकते उठो
    गुलों की तरह से महकते उठो
    उठो खुल गया परचम-ए-इंक़लाब
    निकलता है जिस तरह से आफ़्ताब
    उठो जैसे दरिया में उठती है मौज
    उठो जैसे आँधी की बढ़ती है फ़ौज
    उठो बर्क़ की तरह हँसते हुए
    कड़कते गरजते बरसते हुए
    ग़ुलामी की ज़ंजीर को तोड़ दो
    ज़माने की रफ़्तार को मोड़ दो
    Read Full
    Ali Sardar Jafri
    10
    14 Likes
    फिर इक दिन ऐसा आएगा
    आँखों के दीए बुझ जाएँगे
    हाथों के कँवल कुम्हलाएँगे
    और बर्ग-ए-ज़बांसे नुत्क़ ओ सदा
    की हर तितली उड़ जाएगी
    इक काले समुंदर की तह में
    कलियों की तरह से खिलती हुई
    फूलों की तरह से हंसती हुई
    सारी शक्लें खो जाएंगी
    ख़ूंकी गर्दिश दिल की धड़कन
    सब रागनियां सो जाएंगी
    और नीली फ़ज़ा की मख़मल पर
    हंसती हुई हीरे की ये कनी
    ये मेरी जन्नत मेरी ज़मीं
    इस की सुब्हें इस की शा
    में
    बे-जाने हुए बे-समझे हुए
    इक मुश्त-ए-ग़ुबार-ए-इंसांपर
    शबनम की तरह रो जाएंगी
    हर चीज़ भुला दी जाएगी
    यादों के हसीं बुत-ख़ाने से
    हर चीज़ उठा दी जाएगी
    फिर कोई नहीं ये पूछेगा
    'सरदार' कहाँ है महफ़िल में

    लेकिन मैं यहाँ फिर आऊँगा
    बच्चों के दहन से बोलूंगा
    चिड़ियों की ज़बां से गाऊंगा
    जब बीज हंसेंगे धरती में
    और कोंपलें अपनी उँगली से
    मिट्टी की तहों को छेड़ेंगी
    मैं पत्ती पत्ती कली कली
    अपनी आँखें फिर खोलूंगा
    सरसब्ज़ हथेली पर ले कर
    शबनम के क़तरे तौलूंगा
    मैं रंग-ए-हिना आहंग-ए-ग़ज़ल
    अंदाज़-ए-सुख़न बन जाऊँगा
    रुख़्सार-ए-उरूस-ए-नौ की तरह
    हर आंचल से छिन जाऊँगा
    जाड़ों की हवाएंदामन में
    जब फ़स्ल-ए-ख़िज़ांको लाएंगी
    रह-रौ के जवां क़दमों के तले
    सूखे हुए पत्तों से मेरे
    हँसने की सदाएंआएंगी
    धरती की सुनहरी सब नदियाँ
    आकाश की नीली सब झीलें
    हस्ती से मिरी भर जाएंगी
    और सारा ज़माना देखेगा
    हर क़िस्सा मिरा अफ़्साना है
    हर आशिक़ है 'सरदार' यहाँ
    हर माशूक़ा 'सुलताना' है

    मैं एक गुरेज़ांलम्हा हूँ
    अय्याम के अफ़्सूं-ख़ाने में
    मैं एक तड़पता क़तरा हूँ
    मसरूफ़-ए-सफ़र जो रहता है
    माज़ी की सुराही के दिल से
    मुस्तक़बिल के पैमाने में
    मैं सोता हूंऔर जागता हूँ
    और जाग के फिर सो जाता हूँ
    सदियों का पुराना खेल हूं
    मैं
    मैं मर के अमर हो जाता हूँ
    Read Full
    Ali Sardar Jafri
    9
    4 Likes
    ग़ुलाम तुम भी थे यारों ग़ुलाम हम भी थे
    नहा के ख़ून में आई थी फ़स्ले-आज़ादी

    मज़ा तो तब था कि जब मिल कर
    इलाज-ए-जां करते
    ख़ुद अपने हाथ से
    तामीर-ए-गुलसितां करते

    हमारे दर्द में तुम
    और तुम्हारे दर्द में हम शरीक़ होते
    तो जश्न-ए-आशियां करते

    तुम आओ गुलशन-ए-लाहौर से चमन बर्दोश
    हम आएँ सुब्ह-ए-बनारस की रौशनी ले कर
    हिमालय की हवाओं की ताज़गी ले कर
    और उस के बा'द ये पूछें
    कौन दुश्मन है ?
    Read Full
    Ali Sardar Jafri
    8
    1 Like
    इश्क़ का नग़्मा जुनूँ के साज़ पर गाते हैं हम
    अपने ग़म की आँच से पत्थर को पिघलाते हैं हम

    जाग उठते हैं तो सूली पर भी नींद आती नहीं
    वक़्त पड़ जाए तो अंगारों पे सो जाते हैं हम

    ज़िंदगी को हम से बढ़ कर कौन कर सकता है प्यार
    और अगर मरने पे आ जाएँ तो मर जाते हैं हम

    दफ़्न हो कर ख़ाक में भी दफ़्न रह सकते नहीं
    लाला-ओ-गुल बन के वीरानों पे छा जाते हैं हम

    हम कि करते हैं चमन में एहतिमाम-ए-रंग-ओ-बू
    रू-ए-गेती से नक़ाब-ए-हुस्न सरकाते हैं हम

    अक्स पड़ते ही सँवर जाते हैं चेहरे के नुक़ूश
    शाहिद-ए-हस्ती को यूँँ आईना दिखलाते हैं हम

    मय-कशों को मुज़्दा सदियों के प्यासों को नवेद
    अपनी महफ़िल अपना साक़ी ले के अब आते हैं हम
    Read Full
    Ali Sardar Jafri
    3 Likes
    ये मय-कदा है यहाँ हैं गुनाह जाम-ब-दस्त
    वो मदरसा है वो मस्जिद वहाँ मिलेगा सवाब
    Ali Sardar Jafri
    21 Likes
    दामन झटक के वादी-ए-ग़म से गुज़र गया
    उठ उठ के देखती रही गर्द-ए-सफ़र मुझे
    Ali Sardar Jafri
    23 Likes
    सौ मिलीं ज़िंदगी से सौग़ातें
    हम को आवारगी ही रास आई
    Ali Sardar Jafri
    33 Likes
    इंक़लाब आएगा रफ़्तार से मायूस न हो
    बहुत आहिस्ता नहीं है जो बहुत तेज़ नहीं
    Ali Sardar Jafri
    17 Likes
    पुराने साल की ठिठुरी हुई परछाइयाँ सिमटीं
    नए दिन का नया सूरज उफ़ुक़ पर उठता आता है
    Ali Sardar Jafri
    18 Likes
    काम अब कोई न आएगा बस इक दिल के सिवा
    रास्ते बंद हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा
    Ali Sardar Jafri
    24 Likes

Top 10 of Similar Writers