Altaf Mashhadi

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    फिर दयार-ए-हिन्द को आबाद करने के लिए
    झूम कर उट्ठो वतन आज़ाद करने के लिए
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    ख़िज़ाँ से मानूस हो चुके हैं नहीं ख़बर कुछ बहार क्या है
    तड़प की लज़्ज़त है जिन को हासिल नज़र में उन की क़रार क्या है

    बचेगा कब तक ग़रीब इंसाँ हवादिस-ए-गर्दिश-ए-ज़माँ से
    हवा के झोंकों में जल सकेगा चराग़ ये ए'तिबार क्या है

    क़रीब हो कर भी दूर हैं जैसे एक दरिया के दो किनारे
    यूँँही गुलिस्ताँ में रह के भी हम नहीं हैं वाक़िफ़ बहार क्या है

    चमन के हो कर जो जी रहे हैं ख़िज़ाँ है रश्क-ए-बहार उन की
    परस्तिश-ए-गुल्सिताँ ही ठहरी तो फ़र्क़-ए-ग़ुंचा-ओ-ख़ार क्या है

    नशात-ए-वस्ल-ओ-शराब-ए-दीदार पर जो कम-ज़र्फ़ मुतमइन हैं
    उन्हें कोई किस तरह बताए तअ'य्युश-ए-इंतिज़ार क्या है

    ख़ुदा-रा 'अलताफ़' मुझ से अहबाब मेरी तन्हाइयाँ न छीनें
    ग़मों के होते हुए किसी को ज़रूरत-ए-ग़म-गुसार क्या है
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    आ चल के बसें हम-दम-ए-दैरीना कहीं और
    मैं ढूँढ़ निकालूँगा फ़लक और ज़मीं और

    बचती हुई नज़रों से टपकते हैं फ़साने
    ईजाद तकल्लुम की हुई तर्ज़-ए-हसीं और

    गुल्हा-ए-तबस्सुम पे नज़र डालने वाले
    इन होंठों में पिन्हाँ हैं कई ख़ुल्द-ए-बरीं और

    ज़ौ-बार-ओ-दरख़्शाँ है ये अनवार-ए-ख़ुदी से
    सज्दों की सियाही को है मतलूब जबीं और

    इक अश्क में तब्दील हुआ अपना सरापा
    कुछ माँग ले उल्फ़त से मिरी जान-ए-हज़ीं और

    ज़ुल्फ़ों को ज़रा और भी आँखों पे झुका दो
    मयख़ाने से बादल को करो कुछ तो क़रीं और

    'अलताफ़' मुझे जिस ने दिया दर्द-ए-मोहब्बत
    उस आँख में क्या ऐसी कोई चीज़ नहीं और
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    हो गई इश्क़ में बदनाम जवानी अपनी
    बन गई मरकज़-ए-आलाम जवानी अपनी

    माज़ी-ओ-हाल हैं महरूम-ए-शराब-ओ-नग़्मा
    हाए अफ़्सुर्दा-ओ-नाकाम जवानी अपनी

    आह वो सुब्ह जो थी सुब्ह-ए-बहार-ए-हस्ती
    है उसी सुब्ह की अब शाम जवानी अपनी

    एक तारीक फ़ज़ा एक घटा सा माहौल
    किसी मुफ़्लिस का है अंजाम जवानी अपनी

    उन्हीं राहों में उन्हीं मस्त-ओ-जवाँ गलियों में
    लड़खड़ाई है बहर-गाम जवानी अपनी

    एक वो दिन था कि मय-ख़ानों पे हम भारी थे
    आज है दौर-ए-तह-ए-जाम जवानी अपनी

    इक्तिफ़ा कर के खनकते हुए रोज़-ओ-शब पर
    बन गई ज़ीस्त पर इल्ज़ाम जवानी अपनी

    दिन हुआ धूप चढ़ी ढल गए साए 'अलताफ़'
    अब है इक बुझती हुई शाम जवानी अपनी
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    बहर-ए-हस्ती कोई सराब नहीं
    ज़िंदगी ज़िंदगी है ख़्वाब नहीं

    आह इंसान जिस की आँखों पर
    अपना अंजाम बे-नक़ाब नहीं

    एक ख़ुर्शीद-रुख़ की ज़ुल्फ़ों का
    रात के पास कुछ जवाब नहीं

    ज़िंदगी दर्द से हुई महरूम
    मै-कदा है मगर शराब नहीं

    मुतरिब-ए-वक़्त तेरे हाथों में
    क्यूँ है तलवार और रबाब नहीं

    आदमी आदमी का राज़िक़ है
    नज़्म-ए-आलम मगर ख़राब नहीं

    हाए 'अलताफ़' वो हज़ीं रातें
    जिन की क़िस्मत में माहताब नहीं
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    ज़िंदगी दर्द से क़रीब रहे
    ग़म की दौलत मुझे नसीब रहे

    मौसम ऐसा भी हो कोई सय्याद
    बाग़ जब वक़्फ़-ए-अंदलीब रहे

    मुस्कुरा दो किसी की मय्यत पर
    मौत क्यूँ तीरा-ओ-मुहीब रहे

    वस्ल को वस्ल जानने के लिए
    ज़ीनत-ए-बज़्म इक रक़ीब रहे

    जान का खेल खेलने वालो
    इम्तिहाँ को दर-ए-हबीब रहे

    जाग कर मैं ने काट दीं रातें
    नींद में गुम मगर नसीब रहे

    किस ने 'अलताफ़' दी दुआ मुझ को
    दर्द से ज़िंदगी क़रीब रहे
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    लेटा हुआ हूँ साया-ए-ग़ुर्बत में घर से दूर
    दिल से क़रीं हैं अहल-ए-वतन और नज़र से दूर

    जब तक है दिल रहीन-ए-मआल-ओ-असीर-ए-अक़्ल
    रहना है तुझ से और तिरी रहगुज़र से दूर

    ऐ कैफ़ उन की मस्त निगाहों में छुप के आ
    ऐ दर्द-ए-दम ज़दन में हो मेरे जिगर से दूर

    इक दिन उलटने वाली है ज़ाहिद बिसात-ए-ज़ोहद
    कब तक रहेगा दिल निगह-ए-फ़ित्ना-गर से दूर

    वो कोई ज़िंदगी है जवानी है वो कोई
    ऐ दोस्त जो है तेरे जमाल-ए-नज़र से दूर

    क्या आई तेरे जी में कि तक़दीर यूँँ मुझे
    फेंका है ला के वादी-ए-ग़ुर्बत में घर से दूर

    ऐ हुस्न-ए-बे-पनाह बताए कोई मुझे
    दुनिया की कौन चीज़ है तेरे असर से दूर

    अल्लाह रे नसीब कि पाई है वो फ़ुग़ाँ
    जो उम्र भर रही है फ़रेब-ए-असर से दूर

    'अलताफ़' नाज़ अपनी गदाई पे है मुझे
    दामन है उस का साया-ए-लाल-ओ-गुहरस दूर
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    नज़ाकत मोहब्बत का ग़म खा रही है
    मोहब्बत मोहब्बत हुई जा रही है

    तुम्हारी नज़र के हसीं मय-कदों में
    उरूस-ए-ख़राबात इठला रही है

    नज़र क्या लड़ी एक ख़ंदाँ नज़र से
    जवानी तबस्सुम बनी जा रही है

    तसव्वुर के हाथों में दे कर खिलौने
    जवानी मोहब्बत को बहला रही है

    ये क्या बात है अजनबी अँखड़ियों से
    कोई जानी-बूझी सदा आ रही है

    न फूलों की रुत है न कलियों का मौसम
    मगर बुलबुल-ए-बे-नवा गा रही है

    ये 'अलताफ़' कौन आ गया वक़्त-ए-आख़िर
    क़ज़ा नर्म-ओ-शीरीं हुई जा रही है
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    आह दुनिया सरा-ए-फ़ानी है
    किस क़दर मुख़्तसर कहानी है

    ख़ुद को देता हूँ मुस्कुरा के फ़रेब
    दिल मगर वक़्फ़-ए-नौहा-ख़्वानी है

    मुझ से हंस-बोल लें मिरे साथी
    अब कोई दिन की ज़िंदगानी है

    मौसम-ए-गुल में वो जो आन मिलें
    हम भी जानें कि रुत सुहानी है

    बे-सबब तो नहीं बहे आँसू
    आँसू आँसू में इक कहानी है

    इक सरापा कि रंज-ओ-यास हैं हम
    दर्द-ए-दिल मोनिस-ए-जवानी है

    मुस्कुराऊँ मैं किस तरह 'अलताफ़'
    ताक में दौर-ए-आसमानी है
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    मोहब्बत मोहब्बत जवानी जवानी
    दिलों का फ़साना नज़र की कहानी

    निगाहों को दो इज़्न-ए-अफ़्साना-गोई
    मुरत्तब करो कोई रंगीं कहानी

    ये आँसू हैं तुम खेल सकते हो इन से
    सितारे न समझो इन्हें आसमानी

    ग़मों के सहारे जिए जा रहा हूँ
    तिरा दर्द है हासिल-ए-ज़िंदगानी

    हसीं फ़ुर्सतें हों मुयस्सर तो सुन लो
    नज़र में लिए फिर रहा हूँ कहानी

    तसव्वुर से माँगी है 'अलताफ़' मैं ने
    बहारों में डूबी हुई इक जवानी
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