ज़मीं पे इंसाँ ख़ुदा बना था वबास पहले
    वो ख़ुद को सब कुछ समझ रहा था वबास पहले

    पलक झपकते ही सारा मंज़र बदल गया है
    यहाँ तो मेला लगा हुआ था वबास पहले

    तुम आज हाथों से दूरियाँ नापते हो सोचो
    दिलों में किस दर्जा फ़ासला था वबास पहले

    अजीब सी दौड़ में सब ऐसे लगे हुए थे
    मकाँ मकीनों को ढूँढ़ता था वबास पहले

    हम आज ख़ल्वत में इस ज़माने को रो रहे हैं
    वो जिस से सब को बहुत गिला था वबास पहले

    न जाने क्यूँ आ गया दुआ में मिरी वो बच्चा
    सड़क पे जो फूल बेचता था वबास पहले

    दुआ को उट्ठे हैं हाथ 'अंबर' तो ध्यान आया
    ये आसमाँ सुर्ख़ हो चुका था वबास पहले
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    Ambreen Haseeb Ambar
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    ज़िंदगी-भर एक ही कार-ए-हुनर करते रहे
    इक घरौंदा रेत का था जिस को घर करते रहे

    हम को भी मा'लूम था अंजाम क्या होगा मगर
    शहर-ए-कूफ़ा की तरफ़ हम भी सफ़र करते रहे

    उड़ गए सारे परिंदे मौसमों की चाह में
    इंतिज़ार उन का मगर बूढे शजर करते रहे

    यूँँ तो हम भी कौन सा ज़िंदा रहे इस शहर में
    ज़िंदा होने की अदाकारी मगर करते रहे

    आँख रह तकती रही दिल उस को समझाता रहा
    अपना अपना काम दोनों उम्र-भर करते रहे

    इक नहीं का ख़ौफ़ था सो हम ने पूछा ही नहीं
    याद क्या हम को भी वो दीवार-ओ-दर करते रहे
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    Ambreen Haseeb Ambar
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    ध्यान में आ कर बैठ गए हो तुम भी ना
    मुझे मुसलसल देख रहे हो तुम भी ना

    दे जाते हो मुझ को कितने रंग नए
    जैसे पहली बार मिले हो तुम भी ना

    हर मंज़र में अब हम दोनों होते हैं
    मुझ में ऐसे आन बसे हो तुम भी ना
    इश्क़ ने यूँँ दोनों को आमेज़ किया
    अब तो तुम भी कह देते हो तुम भी ना

    ख़ुद ही कहो अब कैसे सँवर सकती हूँ मैं
    आईने में तुम होते हो तुम भी ना

    बन के हँसी होंटों पर भी रहते हो
    अश्कों में भी तुम बहते हो तुम भी ना

    मेरी बंद आँखें तुम पढ़ लेते हो
    मुझ को इतना जान चुके हो तुम भी ना

    माँग रहे हो रुख़्सत और अब ख़ुद ही
    हाथ में हाथ लिए बैठे हो तुम भी ना
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    Ambreen Haseeb Ambar
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    तुम ने किस कैफ़ियत में मुख़ातब किया
    कैफ़ देता रहा लफ़्ज़-ए-'तू' देर तक
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    वो जंग जिस में मुक़ाबिल रहे ज़मीर मिरा
    मुझे वो जीत भी 'अंबर' न होगी हार से कम
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    उम्र-भर के सज्दों से मिल नहीं सकी जन्नत
    ख़ुल्द से निकलने को इक गुनाह काफ़ी है
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    हम तो सुनते थे कि मिल जाते हैं बिछड़े हुए लोग
    तू जो बिछड़ा है तो क्या वक़्त ने गर्दिश नहीं की
    Ambreen Haseeb Ambar
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    तअल्लुक़ जो भी रक्खो सोच लेना
    कि हम रिश्ता निभाना जानते हैं
    Ambreen Haseeb Ambar
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    मुझ में अब मैं नहीं रही बाक़ी
    मैं ने चाहा है इस क़दर तुम को
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    फ़ैसला बिछड़ने का कर लिया है जब तुम ने
    फिर मिरी तमन्ना क्या फिर मिरी इजाज़त क्यूँँ
    Ambreen Haseeb Ambar
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