Arzoo Lakhnavi

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    आने में झिझक मिलने में हया तुम और कहीं हम और कहीं
    अब अहद-ए-वफ़ा टूटा कि रहा तुम और कहीं हम और कहीं

    बे-आप ख़ुशी से एक इधर कुछ खोया हुआ सा एक उधर
    ज़ाहिर में बहम बातिन में जुदा तुम और कहीं हम और कहीं

    आए तो ख़ुशामद से आए बैठे तो मुरव्वत से बैठे
    मिलना ही ये क्या जब दिल न मिला तुम और कहीं हम और कहीं

    वअदा भी किया तो की न वफ़ा आता है तुम्हें चर्कों में मज़ा
    छोड़ो भी ये ज़िद लुत्फ़ इस में है क्या तुम और कहीं हम और कहीं

    बरगश्ता-नसीब का यूँँ होना सोना भी तो इक करवट सोना
    कब तक ये जुदाई का रोना तुम और कहीं हम और कहीं

    दिल मिलने पे भी पहलू न मिला दुश्मन तो बग़ल ही में है छुपा
    क़ातिल है मोहब्बत की ये हया तुम और कहीं हम और कहीं

    यकसूई-ए-दिल मर्ग़ूब हमें बर्बादी-ए-दिल मतलूब तुम्हें
    इस ज़िद का है और अंजाम ही क्या तुम और कहीं हम और कहीं

    दिल से है अगर क़ाएम रिश्ता तो दूर-ओ-क़रीब की बहस ही क्या
    है ये भी निगाहों का धोका तुम और कहीं हम और कहीं

    सुन रक्खो क़ब्ल-ए-अहद-ए-वफ़ा क़ौल आरज़ू-ए-शैदाई का
    जन्नत भी है दोज़ख़ गर ये हुआ तुम और कहीं हम और कहीं
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    Arzoo Lakhnavi
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    जिन रातों में नींद उड़ जाती है क्या क़हर की रातें होती हैं
    दरवाज़ों से टकरा जाते हैं दीवारों से बातें होती हैं

    आशोब-ए-जुदाई क्या कहिए अन-होनी बातें होती हैं
    आँखों में अँधेरा छाता है जब उजाली रातें होती हैं

    जब वो नहीं होते पहलू में और लंबी रातें होती हैं
    याद आ के सताती रहती है और दिल से बातें होती हैं

    घिर घिर के बादल आते हैं और बे-बरसे खुल जाते हैं
    उम्मीदों की झूटी दुनिया में सूखी बरसातें होती हैं

    उम्मीद का सूरज डूबा है आँखों में अँधेरा छाया है
    दुनिया-ए-फ़िराक़ में दिन कैसा रातें ही रातें होती हैं

    तय करना हैं झगड़े जीने के जिस तरह बने कहते सुनते
    बहरों से भी पाला पड़ता है गूँगों से भी बातें होती हैं

    आँखों में कहाँ रस की बूँदें कुछ है तो लहू की लाली है
    इस बदली हुई रुत में अब तो ख़ूनीं बरसातें होती हैं

    क़िस्मत जागे तो हम सोएँ क़िस्मत सोए तो हम जागें
    दोनों ही को नींद आए जिस में कब ऐसी रातें होती हैं

    जो कान लगा कर सुनते हैं क्या जानें रुमूज़ मोहब्बत के
    अब होंट नहीं हिलने पाते और पहरों बातें होती हैं

    जो नाज़ है वो अपनाता है जो ग़म्ज़ा है वो लुभाता है
    इन रंग-बिरंगी पर्दों में घातों पर घातें होती हैं

    हँसने में जो आँसू आते हैं नैरंग-ए-जहाँ बतलाते हैं
    हर रोज़ जनाज़े जाते हैं हर रोज़ बरातें होती हैं

    जो कुछ भी ख़ुशी से होता है ये दिल का बोझ न बन जाए
    पैमान-ए-वफ़ा भी रहने दो सब झूटी बातें होती हैं

    जब तक है दिलों में सच्चाई सब नाज़-ओ-नियाज़ वहीं तक हैं
    जब ख़ुद-ग़र्ज़ी आ जाती है जुल होते हैं घातें होती हैं

    हिम्मत किस की है जो पूछे ये 'आरज़ू'-ए-सौदाई से
    क्यूँँ साहब आख़िर अकेले में ये किस से बातें होती हैं
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    Arzoo Lakhnavi
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    आज बे-आप हो गए हम भी
    आप को पा के खो गए हम भी

    दाने कम थे दुखों की सिमरन में
    थोड़े मोती पिरो गए हम भी

    देर से थे वो जिस के घेरे में
    उसी झुरमुट में खो गए हम भी

    जा कै ढूँडा कहाँ कहाँ न तुम्हें
    जब न पाया तो खो गए हम भी

    नाम जीने का जागना रख कर
    आज बे नींद सो गए हम भी

    रोएँगे गर तो जग-हँसाई हो
    करते क्या चुप से हो गए हम भी

    हाए रे 'आरज़ू' की बे-आसी
    आप बे-बस थे रो गए हम भी
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    Arzoo Lakhnavi
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    दो तुंद हवाओं पर बुनियाद है तूफ़ाँ की
    या तुम न हसीं होते या में न जवाँ होता
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    दोस्त ने दिल को तोड़ के नक़्श-ए-वफ़ा मिटा दिया
    समझे थे हम जिसे ख़लील का'बा उसी ने ढा दिया
    Arzoo Lakhnavi
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    मोहब्बत वहीं तक है सच्ची मोहब्बत
    जहाँ तक कोई अहद-ओ-पैमाँ नहीं है
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    भोले बन कर हाल न पूछ बहते हैं अश्क तो बहने दो
    जिस से बढ़े बेचैनी दिल की ऐसी तसल्ली रहने दो
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    वफ़ा तुम से करेंगे दुख सहेंगे नाज़ उठाएँगे
    जिसे आता है दिल देना उसे हर काम आता है
    Arzoo Lakhnavi
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    किस ने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी
    झूम के आई घटा टूट के बरसा पानी
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    पूछा जो उन सेे चाँद निकलता है किस तरह
    ज़ुल्फ़ों को रुख़ पे डाल के झटका दिया कि यूँँ
    Arzoo Lakhnavi
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