Atif khan

Top 10 of Atif khan

    मेरे हालात क्यूँ न समझा वो
    मेरे जज़्बात क्यूँ न समझा वो

    मैं मुहब्बत नहीं दिखाता हूँ
    इतनी सी बात क्यूँ न समझा वो
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    यार तुम भी कमाल करते हो
    फिर बुरा मेरा हाल करते हो

    वक़्त पर ख़ुद कभी नहीं मिलते
    और मुझ से मलाल करते हो
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    यार तुम भी कमाल करते हो
    फिर बुरा मेरा हाल करते हो

    वक़्त पर ख़ुद कभी नहीं मिलते
    और मुझ से मलाल करते हो

    इक तो ग़लती मिरी नहीं होती
    तुम मुझी से सवाल करते हो

    कोई खिलता गुलाब लगते हो
    जब भी गालों को लाल करते हो

    ये बताओ ये क़ुदरती है या
    रोज़ इन पर गुलाल करते हो

    हुस्न भी ठीक है मगर 'आतिफ'
    बातें तुम बे-मिसाल करते हो
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    कितने अच्छे थे मिरे दिल को दुखाने वाले
    कितने सच्चे थे मुझे झूठ बताने वाले

    कितने मासूम हैं नज़रों को बचाने वाले
    आज कल वो कहाँ हैं आँख दिखाने वाले

    धूप में बैठ मुझे रोज़ हँसाने वाले
    अब कहाँ हैं वो मिरे बाल घुमाने वाले

    कितने प्यारे थे वो हाथों से खिलाने वाले
    अब कहाँ हैं वो मुझे ज़हर पिलाने वाले

    अब कहाँ हैं मिरी तस्वीर जलाने वाले
    अब कहाँ हैं वो मुझे छोड़ के जाने वाले

    अपने होंठों की तबस्सुम से क़यामत ढा दी
    अब कहाँ हैं वो समुंदर को डुबाने वाले

    ढूँढ़ते फिर रहे हैं नाम मिरा क़ब्रों पर
    जो थे हाथों से मिरा नाम मिटाने वाले

    जो तिरे नाम से रोता है उसे ही 'आतिफ़'
    अब ये तुझ से जुदा करते हैं ज़माने वाले
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    पहले जैसे मिरे हालात से डरता हूँ मैं
    अब मुहब्बत की तो हर बात से डरता हूँ मैं
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    आज अंजान वो राहें थीं
    फैली जिन
    में कभी बाँहें थीं
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    लो अब याद आने लगा वो समा जब
    किसी ने कहा था मुझे सब पता है
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    नज़रें तो वो बचाता रहा
    सपनो में फिर भी आता रहा

    वो मुझे बस सताता रहा
    मैं उसे बस मनाता रहा

    हाल अपना बताता रहा
    और उस को हँसाता रहा

    जाम साक़ी पिलाता रहा
    और ग़ज़लें मैं गाता रहा

    लोगों ने जब मुझे पकड़ा तो
    मुझ को दोषी बताता रहा

    चोर है बोल कर ख़ुद कहीं
    वो खड़ा मुस्कुराता रहा

    फिर सज़ा मुझ को होने लगी
    और वो दिल चुराता रहा

    चाँद तो वो नहीं था मगर
    चाँदनी वो बिछाता रहा

    लिखते लिखते कहानी मिरी
    हर किसी को सुनाता रहा

    शाम होती रही और वो
    दूर आतिफ़ से जाता रहा
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    उस इमारत में कहीं पर सीढ़ियों के सामने
    वो जहाँ तन्हा मिला मुझ सेे वो कमरा याद है
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    अगर तेरा महबूब रूठा हुआ है
    तो आ पास मेरे अजब इक दवा है
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