Aves Sayyad

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    तेरी गली से निकले तो कुछ रास्ते हुए
    तुझ सेे नज़र हटी तो बड़े फ़ैसले हुए

    उल्फ़त में मेरे साथ अजब हादसे हुए
    क़ुर्बत में हिज्र जैसे कई तजरबे हुए

    जो था नहीं कभी वो तअल्लुक़ निभाने में
    इतने क़रीब आए कि बस फ़ासले हुए

    अलमारी तक भरी हुई है तेरी याद से
    हैं बस तेरी पसंद के कपड़े रखे हुए

    हँसते थे साथ देख के दोनों जिसे कभी
    मैं रो पड़ा हूँ फ़िल्म वही देखते हुए

    तस्वीर तेरी आज भी पूरी नहीं बनी
    फिर कॉल आ गए हैं वही मस'अले हुए

    तेरे लबों का ज़ाइक़ा आँखों में आ गया
    देखा तुझे जो ख़्वाब में कल चूमते हुए

    यूँँ हाल तेरे आने से बदला है बाग़ का
    मिट्टी खिली हुई है तो पत्थर हरे हुए

    कानों में गूँजते हैं फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन
    शायद किसी ग़ज़ल के हैं क़ैदी बने हुए

    क्या देखने तुम आ गए सय्यद नदी तले
    क्यूँ ज़िंदगी उभारते हो डूबते हुए
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    तिरंगा शान है मेरी तिरंगा जान है मेरी
    तिरंगा सब सेे ऊँचा हो यही पहचान है मेरी
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    पैर के छालों में चुभते हैं हजारों काँटे
    फूल तब बाग में शायान हुआ करते हैं
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    ईद पर सब फूल ले कर आ रहे हैं
    हो गए हैं ज़िंदगी के ख़त्म रमज़ान
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    अपने टूटे फूटे ख़्वाबों की ता'बीर बनाता हूँ
    मैं बिखरे लफ्ज़ों से काग़ज़ पर तस्वीर बनाता हूँ
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    इस लिए लड़ता है मुझ सेे मेरा दुश्मन
    उस का भी मेरे सिवा कोई नहीं है
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    बहुत से ग़म समेट कर बनाई एक डाइरी
    चुवाव देख रात भर बनाई एक डाइरी

    ये हर्फ़ हर्फ़ लफ़्ज़ लफ़्ज़ क़ब्र है वरक़ वरक़
    दिल-ए-हज़ीं से इस क़दर बनाई एक डाइरी
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    यही बस इक हक़ीक़त है, मुझे तुम सेे मुहब्बत है
    मगर हम मिल नहीं पाए, ये अपनी कैसी क़िस्मत है
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    हाँ वही सब कुछ पुराना चल रहा था
    बैठे थे सुनना सुनाना चल रहा था

    चल रही थी अपनी बज़्म-ए-शायरी भी
    साथ में सिगरट जलाना चल रहा था

    गर मैं साक़ी बहका हूँ, नाराज़ क्यूँ है
    अपना तो पीना पिलाना चल रहा था

    यार इतने तो दिवाने हम नहीं थे
    जो हमारा दिल दुखाना चल रहा था

    दर्द ले कर बैठे थे महफ़िल में हम सब
    और ग़म का कारख़ाना चल रहा था

    कुछ नहीं बदला था दुनिया में कभी बस
    आदमी का आना जाना चल रहा था

    कर रहा था मैं घड़ी तरतीब में तब
    वक़्त का भी अपना गाना चल रहा था

    जाम उस के तर्ज़ पर ही था बनाया
    देखो फिर भी उस का ना ना चल रहा था

    कोई मेरी आँख की पुतली से पूछे
    ख़्वाब में कैसा ज़माना चल रहा था

    लौट आए सब उसे बस देख कर के
    आग पर जो इक दिवाना चल रहा था

    लोग पानी जब बहाने में लगे थे
    मेरा साहिल को मिलाना चल रहा था

    मैं था तुम थे वक़्त रातें चाँदनी थी
    इश्क़ भी कितना सुहाना चल रहा था

    गुम थे अपने दर्दो-ग़म में इस लिए सब
    क्योंकि सय्यद का फ़साना चल रहा था
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    क्या बताए अब तुम्हें क्या चल रहा है
    दिल में बस यादों का मेला चल रहा है

    कोई अनबन ही नहीं हम दोनो में अब
    चाहता है जो वो वैसा चल रहा है

    बेझिझक सोए हुए है हम यहाँ पर
    और ख़्वाबों का ये धंधा चल रहा है

    रात, तन्हाई, उदासी, तेरी यादें
    उस पे ये नुसरत का गाना चल रहा है

    पर कटे हैं, हौसला बाक़ी है अब भी
    पेड़ से गिर कर परिंदा चल रहा है

    वक़्त मेरा हिज्र का है यार लेकिन
    एक दिन तुझ पर बकाया चल रहा है

    ज़िंदा रहना और करना शा'इरी भी
    काम ये शाना-ब-शाना चल रहा है

    फूल है कोई न कोई इत्र तो फिर
    क्या है जो इतना महकता चल रहा है

    लोग अक्सर घर पे आ कर कहते है अब
    आप का साहब ये बेटा चल रहा है

    मैं तो सय्यद कब का थक कर रुक गया हूँ
    धूप में पर मेरा साया चल रहा है
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