Aziz Nabeel

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    दश्त-ओ-सहरा में समुंदर में सफ़र है मेरा
    रंग फैला हुआ ता-हद्द-ए-नज़र है मेरा

    नहीं मालूम, उसे उस की ख़बर है कि नहीं
    वो किसी और का चेहरा है, मगर है मेरा

    तू ने इस बार तो बस मार ही डाला था मुझे
    मैं हूँ ज़िंदा तो मिरी जान हुनर है मेरा

    आज तक अपनी ही तरदीद किए जाता हूँ
    आज तक मेरे ख़द-ओ-ख़ाल में डर है मेरा

    बाग़बाँ ऐसा कि मिट्टी में मिला बैठा हूँ
    शाख़-दर-शाख़ दरख़्तों पे असर है मेरा

    शाएरी, इश्क़, ग़म-ए-रिज़्क़, किताबें, घर-बार
    कई सम्तों में ब-यक-वक़्त गुज़र है मेरा
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    वो दुख नसीब हुए ख़ुद-कफ़ील होने में
    कि उम्र कट गई ख़ुद की दलील होने में

    मुसाफ़िरों के क़दम डगमगाए जाते थे
    अजब नशा था सफ़र के तवील होने में

    वो एक संग जो रस्ते में ईस्तादा था
    उसे ज़माने लगे संग-ए-मील होने में

    मुनाफ़िक़ीन से ख़तरा कभी ग़नीम का ख़ौफ़
    क़यामतें हैं बहुत बे-फ़सील होने में

    अज़ीज़ होने में आसानियाँ बहुत सी थीं
    बहुत से दर्द मिले हैं 'नबील' होने में
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    चाँद तारे इक दिया और रात का कोमल बदन
    सुब्ह-दम बिखरे पड़े थे चार सू मेरी तरह
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    मैं किसी आँख से छलका हुआ आँसू हूँ 'नबील'
    मेरी ताईद ही क्या मेरी बग़ावत कैसी
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    मुसाफ़िरों से कहो अपनी प्यास बाँध रखें
    सफ़र की रूह में सहरा कोई उतर चुका है
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    गुज़र रहा हूँ किसी ख़्वाब के इलाक़े से
    ज़मीं समेटे हुए आसमाँ उठाए हुए
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    वो एक राज़ जो मुद्दत से राज़ था ही नहीं
    उस एक राज़ से पर्दा उठा दिया गया है
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    चुपके चुपके वो पढ़ रहा है मुझे
    धीरे धीरे बदल रहा हूँ मैं
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    फिर नए साल की सरहद पे खड़े हैं हम लोग
    राख हो जाएगा ये साल भी हैरत कैसी
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    ऐ ज़िंदगी ये क्या हुआ तू ही बता थोड़ा-बहुत
    वो भी नाराज़ है मैं भी ख़फ़ा थोड़ा-बहुत

    मंज़िल हमारी क्या हुई ये किस जहाँ में आ गए
    अब सोचना पेशा हुआ कहना रहा थोड़ा-बहुत

    ना-मेहरबां हर रास्ता और बे-वफ़ा इक-इक गली
    हम खो गए इस शहर में रस्ता मिला थोड़ा-बहुत

    ये लुत्फ़ मुझ पर किसलिए एहसान का क्या फ़ाइदा
    अब वक़्त सारा कट चुका, अच्छा-बुरा, थोड़ा-बहुत

    उस बज़्म से बावस्तगी क्या-क्या दिखाएगी नबील
    फिर आ गए तुम हार कर जो कुछ भी था थोड़ा-बहुत
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