न थी हाल की जब हमें अपने ख़बर रहे देखते औरों के ऐब-ओ-हुनर
    पड़ी अपनी बुराइयों पर जो नज़र तो निगाह में कोई बुरा न रहा
    Bahadur Shah Zafar
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    तुम ने किया न याद कभी भूल कर हमें
    हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया
    Bahadur Shah Zafar
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    शाने की हर ज़बाँ से सुने कोई लाफ़-ए-ज़ुल्फ़
    चीरे है सीना रात को ये मू-शिगाफ़-ए-ज़ुल्फ़

    जिस तरह से कि काबे पे है पोशिश-ए-सियाह
    इस तरह इस सनम के है रुख़ पर ग़िलाफ़-ए-ज़ुल्फ़

    बरहम है इस क़दर जो मिरे दिल से ज़ुल्फ़-ए-यार
    शामत-ज़दा ने क्या किया ऐसा ख़िलाफ़-ए-ज़ुल्फ़

    मतलब न कुफ़्र ओ दीं से न दैर ओ हरम से काम
    करता है दिल तवाफ़-ए-इज़ार ओ तवाफ़-ए-ज़ु़ल्फ़

    नाफ़-ए-ग़ज़ाल-ए-चीं है कि है नाफ़ा-ए-ततार
    क्यूँँकर कहूँ कि है गिरह-ए-ज़ुल्फ़ नाफ़-ए-ज़ुल्फ़

    आपस में आज दस्त-ओ-गरेबाँ है रोज़ ओ शब
    ऐ मेहर-वश ज़री का नहीं मू-ए-बाफ़-ए-ज़ुल्फ़

    कहता है कोई जीम कोई लाम ज़ुल्फ़ को
    कहता हूँ मैं 'ज़फ़र' कि मुसत्तह है काफ़-ए-ज़ुल्फ़
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    Bahadur Shah Zafar
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    शमशीर-ए-बरहना माँग ग़ज़ब बालों की महक फिर वैसी ही
    जूड़े की गुंधावट क़हर-ए-ख़ुदा बालों की महक फिर वैसी ही

    आँखें हैं कटोरा सी वो सितम गर्दन है सुराही-दार ग़ज़ब
    और उसी में शराब-ए-सुर्ख़ी-ए-पाँ रखती है झलक फिर वैसी ही

    हर बात में उस की गर्मी है हर नाज़ में उस के शोख़ी है
    क़ामत है क़यामत चाल परी चलने में फड़क फिर वैसी ही

    गर रंग भबूका आतिश है और बीनी शोला-ए-सरकश है
    तो बिजली सी कौंदे है परी आरिज़ की चमक फिर वैसी ही

    नौ-ख़ेज़ कुचें दो ग़ुंचा हैं है नर्म शिकम इक ख़िर्मन-ए-गुल
    बारीक कमर जो शाख़-ए-गुल रखती है लचक फिर वैसी ही

    है नाफ़ कोई गिर्दाब-ए-बला और गोल सुरीं रानें हैं सफ़ा
    है साक़ बिलोरीं शम-ए-ज़िया पाँव की कफ़क फिर वैसी ही

    महरम है हबाब-ए-आब-ए-रवाँ सूरज की किरन है उस पे लिपट
    जाली की कुर्ती है वो बला गोटे की धनक फिर वैसी ही

    वो गाए तो आफ़त लाए है हर ताल में लेवे जान निकाल
    नाच उस का उठाए सौ फ़ित्ने घुँगरू की झनक फिर वैसी ही

    हर बात पे हम से वो जो 'ज़फ़र' करता है लगावट मुद्दत से
    और उस की चाहत रखते हैं हम आज तलक फिर वैसी ही
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    Bahadur Shah Zafar
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    नहीं इश्क़ में इस का तो रंज हमें कि क़रार ओ शकेब ज़रा न रहा
    ग़म-ए-इश्क़ तो अपना रफ़ीक़ रहा कोई और बला से रहा न रहा

    दिया अपनी ख़ुदी को जो हम ने उठा वो जो पर्दा सा बीच में था न रहा
    रहे पर्दे में अब न वो पर्दा-नशीं कोई दूसरा उस के सिवा न रहा

    न थी हाल की जब हमें ख़बर रहे देखते औरों के ऐब ओ हुनर
    पड़ी अपनी बुराइयों पर जो नज़र तो निगाह में कोई बुरा न रहा

    तिरे रुख़ के ख़याल में कौन से दिन उठे मुझ पे न फ़ित्ना-ए-रोज़-ए-जज़ा
    तिरी ज़ुल्फ़ के ध्यान में कौन सी शब मिरे सर पे हुजूम-ए-बला न रहा

    हमें साग़र-ए-बादा के देने में अब करे देर जो साक़ी तो हाए ग़ज़ब
    कि ये अहद-ए-नशात ये दौर-ए-तरब न रहेगा जहाँ में सदा न रहा

    कई रोज़ में आज वो मेहर-लिक़ा हुआ मेरे जो सामने जल्वा-नुमा
    मुझे सब्र ओ क़रार ज़रा न रहा उसे पास-ए-हिजाब-ओ-हया न रहा

    तिरे ख़ंजर ओ तेग़ की आब-ए-रवाँ हुई जब कि सबील-ए-सितम-ज़दगाँ
    गए कितने ही क़ाफ़िले ख़ुश्क-ज़बाँ कोई तिश्ना-ए-आब-ए-बक़ा न रहा

    मुझे साफ़ बताए निगार अगर तो ये पूछूँ मैं रो रो के ख़ून-ए-जिगर
    मले पाँव से किस के हैं दीदा-ए-तर कफ़-ए-पा पे जो रंग-ए-हिना न रहा

    उसे चाहा था मैं ने कि रोक रखूँ मिरी जान भी जाए तो जाने न दूँ
    किए लाख फ़रेब करोड़ फ़ुसूँ न रहा न रहा न रहा न रहा

    लगे यूँँ तो हज़ारों ही तीर-ए-सितम कि तड़पते रहे पड़े ख़ाक पे हम
    वले नाज़ ओ करिश्मा की तेग़-ए-दो-दम लगी ऐसी कि तस्मा लगा न रहा

    'ज़फ़र' आदमी उस को न जानिएगा वो हो कैसा ही साहब-ए-फ़हम-ओ-ज़का
    जिसे ऐश में याद-ए-ख़ुदा न रही जिसे तैश में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा न रहा
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    Bahadur Shah Zafar
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    या मुझे अफ़सर-ए-शाहाना बनाया होता
    या मिरा ताज गदायाना बनाया होता

    अपना दीवाना बनाया मुझे होता तू ने
    क्यूँँ ख़िरद-मंद बनाया न बनाया होता

    ख़ाकसारी के लिए गरचे बनाया था मुझे
    काश ख़ाक-ए-दर-ए-जानाना बनाया होता

    नश्शा-ए-इश्क़ का गर ज़र्फ़ दिया था मुझ को
    उम्र का तंग न पैमाना बनाया होता

    दिल-ए-सद-चाक बनाया तो बला से लेकिन
    ज़ुल्फ़-ए-मुश्कीं का तिरे शाना बनाया होता

    सूफ़ियों के जो न था लायक़-ए-सोहबत तो मुझे
    क़ाबिल-ए-जलसा-ए-रिंदाना बनाया होता

    था जलाना ही अगर दूरी-ए-साक़ी से मुझे
    तो चराग़-ए-दर-ए-मय-ख़ाना बनाया होता

    शोला-ए-हुस्न चमन में न दिखाया उस ने
    वर्ना बुलबुल को भी परवाना बनाया होता

    रोज़ मामूरा-ए-दुनिया में ख़राबी है 'ज़फ़र'
    ऐसी बस्ती को तो वीराना बनाया होता
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    Bahadur Shah Zafar
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    लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में
    किस की बनी है आलम-ए-ना-पाएदार में

    इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसें
    इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़-दार में

    काँटों को मत निकाल चमन से ओ बाग़बाँ
    ये भी गुलों के साथ पले हैं बहार में

    बुलबुल को बाग़बाँ से न सय्याद से गिला
    क़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार में

    कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
    दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
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    Bahadur Shah Zafar
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    मेहनत से है अज़्मत कि ज़माने में नगीं को
    बे-काविश-ए-सीना न कभी नामवरी दी
    Bahadur Shah Zafar
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    बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
    जैसी अब है तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी

    ले गया छीन के कौन आज तिरा सब्र ओ क़रार
    बे-क़रारी तुझे ऐ दिल कभी ऐसी तो न थी

    उस की आँखों ने ख़ुदा जाने किया क्या जादू
    कि तबीअ'त मिरी माइल कभी ऐसी तो न थी

    अक्स-ए-रुख़्सार ने किस के है तुझे चमकाया
    ताब तुझ में मह-ए-कामिल कभी ऐसी तो न थी

    अब की जो राह-ए-मोहब्बत में उठाई तकलीफ़
    सख़्त होती हमें मंज़िल कभी ऐसी तो न थी

    पा-ए-कूबाँ कोई ज़िंदाँ में नया है मजनूँ
    आती आवाज़-ए-सलासिल कभी ऐसी तो न थी

    निगह-ए-यार को अब क्यूँँ है तग़ाफ़ुल ऐ दिल
    वो तिरे हाल से ग़ाफ़िल कभी ऐसी तो न थी

    चश्म-ए-क़ातिल मिरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
    जैसी अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी

    क्या सबब तू जो बिगड़ता है 'ज़फ़र' से हर बार
    ख़ू तिरी हूर-शमाइल कभी ऐसी तो न थी
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    Bahadur Shah Zafar
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    बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
    जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
    Bahadur Shah Zafar
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