Danish Naqvi

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    मुसीबतें सर-बरहना होंगी अक़ीदतें बे-लिबास होंगी
    थके हुओं को कहाँ पता था कि सुब्हें यूँँ बद-हवा से होंगी

    तू देख लेना हमारे बच्चों के बाल जल्दी सफ़ेद होंगे
    हमारी छोड़ी हुई उदासी से सात नस्लें उदास होंगी

    कहीं मिलें तुम को भूरी रंगत की गहरी आँखें मुझे बताना
    मैं जानता हूँ कि ऐसी आँखें बहुत अज़िय्यत-शनास होंगी

    मैं सर्दियों की ठिठुरती शामों के सर्द लम्हों में सोचता हूँ
    वो सुर्ख़ हाथों की गर्म पोरें न-जाने अब किस को रास होंगी

    ये जिस की बेटी के सर की चादर कई जगह से फटी हुई है
    तुम उस के गाँव में जा के देखो तो आधी फ़स्लें कपास होंगी
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    मुश्किल दिन भी आए लेकिन फ़र्क न आया यारी में
    हम ने पूरी जान लगाई उस की ताबेदारी में

    बेईमानी करते तो फिर शायद जीत के आ जाते
    चाहे हार के वापिस आए खेले अपनी बारी में

    मीठे मीठे होंठ हिलाए कड़वी कड़वी बातें की
    कीकर और गुलाब लगाया उस ने एक क्यारी में

    तेरी जानिब उठने वाली आँखों का रुख़ मोड़ लिया
    हम ने अपने ऐब दिखाए तेरी पर्दादारी में

    जाने अब वो किस के साथ निकलता होगा रातों को
    जाने कौन लगाता होगा दो घंटे तैयारी में
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    सब लोग कहानी में ही मशरूफ़ रहे थे
    दरअस्ल अदाकार हक़ीक़त में मरे थे

    जाते हुए कमरे की किसी चीज़ को छू दे
    मैं याद करूँँगा कि तेरे हाथ लगे थे

    आँखें भी तेरी फतह न कर पाए अभी तक
    किस लम्हा ए बेकार में हम लोग बने थे

    मैं ने तो कहा था निकल जाते है दोनों
    उस वक़्त कहानी में सभी लोग नए थे
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    माहौल मुनासिब हो तो ऊपर नहीं जाते
    हम ताज़ा घुटन छोड़ के छत पर नहीं जाते

    देखो मुझे अब मेरी जगह से न हिलाना
    फिर तुम मुझे तरतीब से रख कर नहीं जाते

    बदनाम हैं सदियों से ही काँटों की वजह से
    आदत से मगर आज भी कीकर नहीं जाते

    जिस दिन से शिकारी ने अदा की कोई मन्नत
    दरबार पे उस दिन से कबूतर नहीं जाते

    सो तुम मुझे हैरत-ज़दा आँखों से न देखो
    कुछ लोग सँभल जाते हैं सब मर नहीं जाते
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    तसल्ली कर के ही आवाज़ देना
    जिसे भी आख़री आवाज़ देना

    इसी लहजे की फरमाइश है मेरी
    मुझे बिल्कुल यही आवाज़ देना

    तुम्हारी सम्त है सारी तवज़्ज़ोह

    गर चाहो कभी आवाज़ देना

    मुकर जाते हो फिर तुम पूछने पर
    बुलाना हो तभी आवाज़ देना

    ये आवाज़ों का फीकापन तो जाए
    ज़रा रस घोलती आवाज़ देना

    हमारा हक़ भी है तुम पर यक़ीनन
    हमें भी ज़िन्दगी आवाज़ देना
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    आवाज़ की दूरी पे खड़ा सोच रहा हूँ
    अब कौन मुझे देगा सदा सोच रहा हूँ

    छोटी सी नज़र आती है अतराफ़ की हर शय
    इस वक़्त मैं कुछ इतना बड़ा सोच रहा हूँ

    क्या सोचना था मुझ को तिरे बारे में लेकिन
    अफ़्सोस तिरे बारे में क्या सोच रहा हूँ

    तू ने तो मिरे बारे में सोचा भी नहीं है
    मैं फिर भी कोई अच्छा बुरा सोच रहा हूँ

    जिस दिन से उठीं मुझ पे तिरी सब्ज़ सी आँखें
    मैं पेड़ नहीं फिर भी हरा सोच रहा हूँ

    नुक़सान बहुत से थे गए साल के 'दानिश'
    लेकिन तिरे बारे में बड़ा सोच रहा हूँ
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    तो देख लेना हमारे बच्चों के बाल जल्दी सफ़ेद होंगे
    हमारी छोड़ी हुई उदासी से सात नस्लें उदास होंगी
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    देखो मुझे अब मेरी जगह से न हिलाना
    फिर तुम मुझे तरतीब से रख कर नहीं जाते
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    सो तुम मुझे हैरत-ज़दा आँखों से न देखो
    कुछ लोग सँभल जाते हैं सब मर नहीं जाते
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    जाते हुए कमरे की किसी चीज़ को छू दे
    मैं याद करूँँगा के तेरे हाथ लगे थे
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