मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
    मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
    तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
    तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
    तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
    तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
    यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए
    और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
    राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

    अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
    रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए
    जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
    ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए

    जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
    पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
    लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
    अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे

    और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
    राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
    मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
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    Faiz Ahmad Faiz
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    दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
    वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के

    वीराँ है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास हैं
    तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के

    इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन
    देखे हैं हम ने हौसले परवरदिगार के

    दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
    तुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के

    भूले से मुस्कुरा तो दिए थे वो आज 'फ़ैज़'
    मत पूछ वलवले दिल-ए-ना-कर्दा-कार के
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    Faiz Ahmad Faiz
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    मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
    मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
    मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
    तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
    तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
    तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
    तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
    यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए
    और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
    राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

    अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
    रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए
    जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
    ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए

    जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
    पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
    लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
    अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे

    और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
    राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
    मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
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    Faiz Ahmad Faiz
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    हम मेहनतकश इस दुनिया से जब अपना हिस्सा माँगेंगे
    इक बाग़ नहीं, इक खेत नहीं, हम सारी दुनिया माँगेंगे
    Faiz Ahmad Faiz
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    तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
    तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
    Faiz Ahmad Faiz
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    तू ने देखी है वो पेशानी वो रुख़्सार वो होंठ
    ज़िंदगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हम ने

    तुझ पे उठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें
    तुझ को मालूम है क्यूँ उम्र गँवा दी हम ने
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    Faiz Ahmad Faiz
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    गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है, जो चाहो लगा दो डर कैसा
    गर जीत गए तो क्या कहना, हारे भी तो बाज़ी मात नहीं
    Faiz Ahmad Faiz
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    और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
    राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
    Faiz Ahmad Faiz
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    दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
    लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
    Faiz Ahmad Faiz
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    वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे
    जो इश्क़ को काम समझते थे
    या काम से आशिक़ी करते थे
    हम जीते-जी मसरूफ़ रहे
    कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
    काम इश्क़ के आड़े आता रहा
    और इश्क़ से काम उलझता रहा
    फिर आख़िर तंग आ कर हम ने
    दोनों को अधूरा छोड़ दिया
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    Faiz Ahmad Faiz
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