Habib Jalib

Top 10 of Habib Jalib

    ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना
    पत्थर को गुहर दीवार को दर कर्गस को हुमा क्या लिखना
    इक हश्र बपा है घर में दम घुटता है गुम्बद-ए-बे-दर में
    इक शख़्स के हाथों मुद्दत से रुस्वा है वतन दुनिया-भर में
    ऐ दीदा-वरो इस ज़िल्लत को क़िस्मत का लिखा क्या लिखना
    ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

    ये अहल-ए-हश्म ये दारा-ओ-जम सब नक़्श बर-आब हैं ऐ हमदम
    मिट जाएँगे सब पर्वर्दा-ए-शब ऐ अहल-ए-वफ़ा रह जाएँगे हम
    हो जाँ का ज़ियाँ पर क़ातिल को मासूम-अदा क्या लिखना
    ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

    लोगों पे ही हम ने जाँ वारी की हम ने ही उन्हीं की ग़म-ख़्वारी
    होते हैं तो हों ये हाथ क़लम शाएर न बनेंगे दरबारी
    इब्लीस-नुमा इंसानों की ऐ दोस्त सना क्या लिखना
    ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

    हक़ बात पे कोड़े और ज़िंदाँ बातिल के शिकंजे में है ये जाँ
    इंसाँ हैं कि सह
    में बैठे हैं खूँ-ख़्वार दरिंदे हैं रक़्साँ
    इस ज़ुल्म-ओ-सितम को लुत्फ़-ओ-करम इस दुख को दवा क्या लिखना
    ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

    हर शाम यहाँ शाम-ए-वीराँ आसेब-ज़दा रस्ते गलियाँ
    जिस शहर की धुन में निकले थे वो शहर दिल-ए-बर्बाद कहाँ
    सहरा को चमन बन कर गुलशन बादल को रिदा क्या लिखना
    ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

    ऐ मेरे वतन के फ़नकारो ज़ुल्मत पे न अपना फ़न वारो
    ये महल-सराओं के बासी क़ातिल हैं सभी अपने यारो
    विर्से में हमें ये ग़म है मिला इस ग़म को नया क्या लिखना
    ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना
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    दीप जिस का महल्लात ही में जले
    चंद लोगों की ख़ुशियों को ले कर चले
    वो जो साए में हर मस्लहत के पले
    ऐसे दस्तूर को सुब्ह-ए-बे-नूर को
    मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता

    मैं भी ख़ाइफ़ नहीं तख़्ता-ए-दार से
    मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़्यार से
    क्यूँँ डराते हो ज़िंदाँ की दीवार से
    ज़ुल्म की बात को जहल की रात को
    मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता

    फूल शाख़ों पे खिलने लगे तुम कहो
    जाम रिंदों को मिलने लगे तुम कहो
    चाक सीनों के सिलने लगे तुम कहो
    इस खुले झूट को ज़ेहन की लूट को
    मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता

    तुम ने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ
    अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फ़ुसूँ
    चारा-गर दर्दमंदों के बनते हो क्यूँँ
    तुम नहीं चारा-गर कोई माने मगर
    मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता
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    फिर कभी लौट कर न आएँगे
    हम तिरा शहर छोड़ जाएँगे

    दूर-उफ़्तादा बस्तियों में कहीं
    तेरी यादों से लौ लगाएँगे

    शम-ए-माह-ओ-नुजूम गुल कर के
    आँसुओं के दिए जलाएँगे

    आख़िरी बार इक ग़ज़ल सुन लो
    आख़िरी बार हम सुनाएँगे

    सूरत-ए-मौजा-ए-हवा 'जालिब'
    सारी दुनिया की ख़ाक उड़ाएँगे
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    अपनों ने वो रंज दिए हैं बेगाने याद आते हैं
    देख के उस बस्ती की हालत वीराने याद आते हैं

    उस नगरी में क़दम क़दम पे सर को झुकाना पड़ता है
    उस नगरी में क़दम क़दम पर बुत-ख़ाने याद आते हैं

    आँखें पुर-नम हो जाती हैं ग़ुर्बत के सहराओं में
    जब उस रिम-झिम की वादी के अफ़्साने याद आते हैं

    ऐसे ऐसे दर्द मिले हैं नए दयारों में हम को
    बिछड़े हुए कुछ लोग पुराने याराने याद आते हैं

    जिन के कारन आज हमारे हाल पे दुनिया हस्ती है
    कितने ज़ालिम चेहरे जाने पहचाने याद आते हैं

    यूँँ न लुटी थी गलियों दौलत अपने अश्कों की
    रोते हैं तो हम को अपने ग़म-ख़ाने याद आते हैं

    कोई तो परचम ले कर निकले अपने गरेबाँ का 'जालिब'
    चारों जानिब सन्नाटा है दीवाने याद आते हैं
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    हुजूम देख के रस्ता नहीं बदलते हम
    किसी के डर से तक़ाज़ा नहीं बदलते हम

    हज़ार ज़ेर-ए-क़दम रास्ता हो ख़ारों का
    जो चल पड़ें तो इरादा नहीं बदलते हम

    इसी लिए तो नहीं मो'तबर ज़माने में
    कि रंग-ए-सूरत-ए-दुनिया नहीं बदलते हम

    हवा को देख के 'जालिब' मिसाल-ए-हम-अस्राँ
    बजा ये ज़ोम हमारा नहीं बदलते हम
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    Habib Jalib
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    और सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाक़त लिखना
    रह गया काम हमारा ही बग़ावत लिखना

    लाख कहते रहें ज़ुल्मत को न ज़ुल्मत लिखना
    हम ने सीखा नहीं प्यारे ब-इजाज़त लिखना

    न सिले की न सताइश की तमन्ना हम को
    हक़ में लोगों के हमारी तो है आदत लिखना

    हम ने जो भूल के भी शह का क़सीदा न लिखा
    शायद आया इसी ख़ूबी की बदौलत लिखना

    इस से बढ़ कर मेरी तहसीन भला क्या होगी
    पढ़ के ना-ख़ुश हैं मेरा साहब-ए-सरवत लिखना

    दहर के ग़म से हुआ रब्त तो हम भूल गए
    सर्व क़ामत को जवानी को क़यामत लिखना

    कुछ भी कहते हैं कहीं शह के मुसाहिब 'जालिब'
    रंग रखना यही अपना इसी सूरत लिखना
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    दुश्मनों ने जो दुश्मनी की है
    दोस्तों ने भी क्या कमी की है

    ख़ामुशी पर हैं लोग ज़ेर-ए-इताब
    और हम ने तो बात भी की है

    मुतमइन है ज़मीर तो अपना
    बात सारी ज़मीर ही की है

    अपनी तो दास्ताँ है बस इतनी
    ग़म उठाए हैं शाएरी की है

    अब नज़र में नहीं है एक ही फूल
    फ़िक्र हम को कली कली की है

    पा सकेंगे न उम्र भर जिस को
    जुस्तुजू आज भी उसी की है

    जब मह-ओ-महर बुझ गए 'जालिब'
    हम ने अश्कों से रौशनी की है
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    दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुख सहते हैं
    हम ने सुना था इस बस्ती में दिल वाले भी रहते हैं

    बीत गया सावन का महीना मौसम ने नज़रें बदलीं
    लेकिन इन प्यासी आँखों से अब तक आँसू बहते हैं

    एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्ज़ाम नहीं
    दुनिया वाले दिल वालों को और बहुत कुछ कहते हैं

    जिन की ख़ातिर शहर भी छोड़ा जिन के लिए बदनाम हुए
    आज वही हम से बेगाने बेगाने से रहते हैं

    वो जो अभी इस राह-गुज़र से चाक-गरेबाँ गुज़रा था
    उस आवारा दीवाने को 'जालिब' 'जालिब' कहते हैं
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    Habib Jalib
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    तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था
    उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था

    कोई ठहरा हो जो लोगों के मुक़ाबिल तो बताओ
    वो कहाँ हैं कि जिन्हें नाज़ बहुत अपने तईं था

    आज सोए हैं तह-ए-ख़ाक न जाने यहाँ कितने
    कोई शो'ला कोई शबनम कोई महताब-जबीं था

    अब वो फिरते हैं इसी शहर में तन्हा लिए दिल को
    इक ज़माने में मिज़ाज उन का सर-ए-अर्श-ए-बरीं था

    छोड़ना घर का हमें याद है 'जालिब' नहीं भूले
    था वतन ज़ेहन में अपने कोई ज़िंदाँ तो नहीं था
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    दीप जिस का महल्लात ही में जले
    चंद लोगों की ख़ुशियों को ले कर चले
    वो जो साए में हर मस्लहत के पले
    ऐसे दस्तूर को सुब्ह-ए-बे-नूर को
    मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता

    मैं भी ख़ाइफ़ नहीं तख़्ता-ए-दार से
    मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़्यार से
    क्यूँँ डराते हो ज़िंदाँ की दीवार से
    ज़ुल्म की बात को जहल की रात को
    मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता

    फूल शाख़ों पे खिलने लगे तुम कहो
    जाम रिंदों को मिलने लगे तुम कहो
    चाक सीनों के सिलने लगे तुम कहो
    इस खुले झूट को ज़ेहन की लूट को
    मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता

    तुम ने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ
    अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फ़ुसूँ
    चारा-गर दर्दमंदों के बनते हो क्यूँँ
    तुम नहीं चारा-गर कोई माने मगर
    मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता
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