Hafeez Merathi

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    कभी कभी हमें दुनिया हसीन लगती थी
    कभी कभी तिरी आँखों में प्यार देखते थे
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    वो वक़्त का जहाज़ था करता लिहाज़ क्या
    मैं दोस्तों से हाथ मिलाने में रह गया
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    इक अजनबी के हाथ में दे कर हमारा हाथ
    लो साथ छोड़ने लगा आख़िर ये साल भी
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    लहू से अपने ज़मीं लाला-ज़ार देखते थे
    बहार देखने वाले बहार देखते थे

    सुरूर एक झलक का तमाम उम्र रहा
    हवस-परस्त थे जो बार बार देखते थे

    कभी कभी हमें दुनिया हसीन लगती थी
    कभी कभी तिरी आँखों में प्यार देखते थे

    चला वो दौर-ए-सितम घर में छुप के बैठ गए
    जो हर सलीब को मर्दाना-वार देखते थे
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    सितम की तेग़ ये कहती है सर न ऊँचा कर
    पुकारती है बुलंदी कि ज़िंदगी है इधर

    चमन में हम न रहेंगे तिरे पलटने तक
    ठहर ठहर ज़रा जाती हुई बहार ठहर

    कोई फ़रेब न खाए सफ़ेद-पोशी से
    न जाने कितने सितारे निगल गई है सहर

    तू जौहरी है तो ज़ेबा नहीं तुझे ये गुरेज़
    मुझे परख मिरी शोहरत का इंतिज़ार न कर

    'हफ़ीज़' कितने ही चेहरे उदास होने लगे
    हमारे फ़न को सराहें बहुत न अहल-ए-नज़र
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    इस दीवाने दिल को देखो क्या शेवा अपनाए है
    उस पर ही विश्वास करे है जिस से धोका खाए है

    सारा कलेजा कट कट कर जब अश्कों में बह जाए है
    तब कोई फ़रहाद बने है तब मजनूँ कहलाए है

    मैं जो तड़प कर रोऊँ हूँ तो ज़ालिम यूँँ फ़रमाए है
    इतना गहरा घाव कहाँ है नाहक़ शोर मचाए है

    तुम ने मुझ को रंज दिया तो इस में तुम्हारा दोश नहीं
    फूल भी काँटा बन जाए है वक़्त बुरा जब आए है
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    कौन कहता है कि महरूमी का शिकवा न करो
    हाँ मगर साक़ी-ए-मय-ख़ाना को रुस्वा न करो

    ज़िक्र छिड़ जाए अगर क़ौम की बद-बख़्ती का
    रहनुमाओं की तरफ़ कोई इशारा न करो

    ज़ेहन संजीदा मसाइल से हटाने के लिए
    रोज़ ये शैख़ ओ बरहमन का तमाशा न करो

    एक भी लफ़्ज़ हटाने की नहीं गुंजाइश
    मेरे पैग़ाम-ए-मोहब्बत का ख़ुलासा न करो

    ये तअल्लुक़ की ख़राशें भी मज़ा देती हैं
    रूठ जाए कोई तुम से तो मनाया न करो

    आज भी मैं नहीं इंसाँ से मायूस कि जब
    लोग कहते हैं ख़ुदा पर भी भरोसा न करो
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    बड़े अदब से ग़ुरूर-ए-सितम-गराँ बोला
    जब इंक़लाब के लहजे में बे-ज़बाँ बोला

    तकोगे यूँँही हवाओं का मुँह भला कब तक
    ये ना-ख़ुदाओं से इक रोज़ बादबाँ बोला

    चमन में सब की ज़बाँ पर थी मेरी मज़लूमी
    मिरे ख़िलाफ़ जो बोला तो बाग़बाँ बोला

    यही बहुत है कि ज़िंदा तो हो मियाँ-साहब
    ज़माना सुन के मिरे ग़म की दास्ताँ बोला

    हिसार-ए-जब्र में ज़िंदा बदन जलाए गए
    किसी ने दम नहीं मारा मगर धुआँ बोला

    असर हुआ तो ये तक़रीर का कमाल नहीं
    मिरा ख़ुलूस मुख़ातब था मैं कहाँ बोला

    कहा न था कि नवाज़ेंगे हम 'हफ़ीज़' तुझे
    उड़ा के वो मिरे दामन की धज्जियाँ बोला
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    बे-सहारों का इंतिज़ाम करो
    या'नी इक और क़त्ल-ए-आम करो

    ख़ैर-ख़्वाहों का मशवरा ये है
    ठोकरें खाओ और सलाम करो

    दब के रहना हमें नहीं मंज़ूर
    ज़ालिमो जाओ अपना काम करो

    ख़्वाहिशें जाने किस तरफ़ ले जाएँ
    ख़्वाहिशों को न बे-लगाम करो

    मेज़बानों में हो जहाँ अन-बन
    ऐसी बस्ती में मत क़याम करो

    आप छट जाएँगे हवस वाले
    तुम ज़रा बे-रुख़ी को आम करो

    ढूँडते हो गिरों पड़ों को क्यूँँ
    उड़ने वालों को ज़ेर-ए-दाम करो

    देने वाला बड़ाई भी देगा
    तुम समाई का एहतिमाम करो

    बद-दुआ दे के चल दिया वो फ़क़ीर
    कह दिया था कि कोई काम करो

    ये हुनर भी बड़ा ज़रूरी है
    कितना झुक कर किसे सलाम करो

    सर-फिरों में अभी हरारत है
    इन जियालों का एहतिराम करो

    साँप आपस में कह रहे हैं 'हफ़ीज़'
    आस्तीनों का इंतिज़ाम करो
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    आबाद रहेंगे वीराने शादाब रहेंगी ज़ंजीरें
    जब तक दीवाने ज़िंदा हैं फूलेंगी फलेंगी ज़ंजीरें

    आज़ादी का दरवाज़ा भी ख़ुद ही खोलेंगी ज़ंजीरें
    टुकड़े टुकड़े हो जाएँगी जब हद से बढ़ेंगी ज़ंजीरें

    जब सब के लब सिल जाएँगे हाथों से क़लम छिन जाएँगे
    बातिल से लोहा लेने का एलान करेंगी ज़ंजीरें

    अंधों बहरों की नगरी में यूँँ कौन तवज्जोह करता है
    माहौल सुनेगा देखेगा जिस वक़्त बजेंगी ज़ंजीरें

    जो ज़ंजीरों से बाहर हैं आज़ाद उन्हें भी मत समझो
    जब हाथ कटेंगे ज़ालिम के उस वक़्त कटेंगी ज़ंजीरें

    ज़ंजीरें तो कट जाएँगी हाँ उन के निशाँ रह जाएँगे
    मेरा क्या है ज़ालिम तुझ को बदनाम करेंगी ज़ंजीरें

    ये दौर भी हैं सय्यादी के ये ढंग भी हैं जल्लादी के
    सिमटेगी सिकुड़ेंगी ज़ंजीरें फैलेंगी फलेंगी ज़ंजीरें

    ले दे के 'हफ़ीज़' उन सेे ही थी उम्मीद-ए-वफ़ा दीवानों को
    क्या होगा जब दीवानों से नाता तोड़ेंगी ज़ंजीरें
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