उस के मन के भीतर क्या क्या नहीं हुआ
    वो फूल जो किसी तितली का नहीं हुआ

    इश्क़ में बँटता नहीं बराबर से कुछ भी
    मैं ज़ाया' हो गया वो तन्हा नहीं हुआ

    उस ने तो तीसरी मोहब्बत भी कर ली
    मुझ सेे घर के बाहर जाना नहीं हुआ

    टूट गया था अंदर तक पर कुछ न कहा
    वो ख़ुश थी बात का तमाशा नहीं हुआ


    मेरा नाम बदल कर बला रखा जाए

    मेरे साथ किसी का अच्छा नहीं हुआ
    मली गई थी कालिख कुछ इस तरह कि फिर

    अंदर तक में कभी उजाला नहीं हुआ
    इत्र लगा कर आई थी ख़ुद-कुशी मगर

    मैं उस ख़ुशबू का दीवाना नहीं हुआ
    मेरे गिरने पर हँसने वाले लोगों

    मेरे मरने पर कुछ हूँ हा नहीं हुआ
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    harshit karnatak
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    सभी के दिलों से निकाला हुआ
    कहाँ जाएगा यार हारा हुआ

    अगर जाएगा अब पुकारा मुझे
    नहीं आएगा अब पुकारा हुआ

    सवालात कर के मेरे इश्क़ पर
    वफ़ा की हया का तमाशा हुआ

    मोहब्बत वफ़ा या वो इकरार ही
    नहीं याद क्या जान-ए-जाँ क्या हुआ

    सभी का रहा मैं बड़ा ही अज़ीज़
    सभी का मुझी से किनारा हुआ

    हमारा हमारा हमारा ये दिल
    तुम्हारा तुम्हारा तुम्हारा हुआ
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    harshit karnatak
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    उस पार जिस को पाने की जिन लोगों में उम्मीद है
    कैसे कहूँ उन को कि वो जो चीज़ है बेदीद है

    दीवार क्यूँँ बढ़ने लगी है हर किसी के बीच में
    ये सब फ़क़त बातें नहीं ये सब मेरी तन्क़ीद है
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    harshit karnatak
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    एक तो सब हम सेे बरहम हैं
    ऊपर से फिर ग़म ही ग़म हैं

    किस पर चीखें चिल्लाएँ हम
    अब तो केवल हम ही हम हैं

    ओ क़हक़हा लगाने वालों
    दर्द ठहाकों के हर दम हैं

    बाहर इक दो जाम बचे हैं
    अंदर अब भी सौ सौ ग़म हैं

    नक़ली फूलों पर भी देखो
    जमी हुई ढेरों शबनम हैं
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    harshit karnatak
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    कैसे कह दूँ सब को उस पल कुछ नइँ हुआ मुझे
    जिस पल हँसते-हँसते उस ने भाई कहा मुझे

    बात हँसी की है लेकिन मेरा सच तो ये है
    हुआ नहीं कुछ लेकिन कुछ भी हो सकता था मुझे
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    harshit karnatak
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    मर कर ही अब उस के दिल में उतरा जा सकता है
    तीर नुकीला न हो तो कितना गहरा जा सकता है
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    बेताबी-ए-दिल के वास्ते कोई मरासिम तो रख
    जाते-जाते कुछ तो कह दे कोई मरासिम तो रख
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    हाल ऐसा के बता भी कुछ नहीं सकता किसी को
    लोग ऐसे की गले से भी नहीं मुझ को लगाते
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    चाहत थी आबाद रहे पर मर जाए भी चाहा
    मेरी कैसी मजबूरी है कैसा पागलपन है
    harshit karnatak
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    तू ने यार कभी भी खिलता फूल नहीं देखा
    तू जब उस को देखेगा तो कैसे देखेगा
    harshit karnatak
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