उस के मन के भीतर क्या क्या नहीं हुआ
वो फूल जो किसी तितली का नहीं हुआ
इश्क़ में बँटता नहीं बराबर से कुछ भी
मैं ज़ाया' हो गया वो तन्हा नहीं हुआ
उस ने तो तीसरी मोहब्बत भी कर ली
मुझ सेे घर के बाहर जाना नहीं हुआ
टूट गया था अंदर तक पर कुछ न कहा
वो ख़ुश थी बात का तमाशा नहीं हुआ
मेरा नाम बदल कर बला रखा जाए
मेरे साथ किसी का अच्छा नहीं हुआ
मली गई थी कालिख कुछ इस तरह कि फिर
अंदर तक में कभी उजाला नहीं हुआ
इत्र लगा कर आई थी ख़ुद-कुशी मगर
मैं उस ख़ुशबू का दीवाना नहीं हुआ
मेरे गिरने पर हँसने वाले लोगों
मेरे मरने पर कुछ हूँ हा नहीं हुआ
Read Full