सभी ने अपने अपने शे'र छाँटे
    ग़ज़ल जैसे हो गुलदस्ता हमारा
    Himanshu Upadhyay Som
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    फँसोगे गुनाहों के दलदल में इक दिन
    अगर ग़लतियों से किनारा करोगे
    Himanshu Upadhyay Som
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    नज़र टीका उन को लगाना पड़ेगा
    उन्हें इस जहाँ से छुपाना पड़ेगा

    तबीअत न नासाज़ हो जाए उन की,
    दु'आओं में सर को झुकाना पड़ेगा

    यक़ीं देख कर तो नहीं हो रहा है,
    मुझे उन को छू कर ही आना पड़ेगा

    बुलाने से घर तो नहीं आने वाली,
    उन्हें ख़्वाब में ही बुलाना पड़ेगा

    मेरा दिल उन्होंने चुराया है पागल
    मुझे भी कुछ उन का चुराना पड़ेगा

    लिखा "सोम" ने एक लड़की की ख़ातिर
    ये मम्मी से मुझ को बताना पड़ेगा
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    Himanshu Upadhyay Som
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    ये जहाँ है हिसार औरत का
    है सभी पर उधार औरत का

    ख़ूबियाँ और भी हैं उस
    में पर
    सबने देखा निखार औरत का

    आदमी को तो फिर भी छुट्टी है
    रह्न है पर करार औरत का

    रौनक़े घर की सब इन्हीं से हैं
    घर करे इंतिज़ार औरत का

    जन्म औरत की कोख से ले कर
    मर्द करते शिकार औरत का

    घर में सब का ख़याल रखती है
    है यही रोज़गार औरत का
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    Himanshu Upadhyay Som
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    सूर्य अपनी रौशनी से चाँद रौशन ज्यूँ करे
    तू भी अपने नूर से वैसे ही रौशन कर मुझे
    Himanshu Upadhyay Som
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    ख़ूब-सूरत गुलाब सी लड़की
    हम ने देखी है ख़्वाब सी लड़की

    बाल हैं स्याह रात के जैसे
    रुख़ से है माहताब सी लड़की

    राज़ ख़ुद में कई समेटे हुए
    बंद है वो किताब सी लड़की

    प्यार ऊँचाइयों से है उस को
    उड़ती फिरती उक़ाब सी लड़की

    सब मुसाफिर हैं इक मरुस्थल के
    और वो है यख़ आब सी लड़की

    एक लम्हें में हो गई गायब
    एक दिलकश सराब सी लड़की
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    Himanshu Upadhyay Som
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    लोग जो दिल के पास होते हैं
    दूर उन के निवास होते हैं
    Himanshu Upadhyay Som
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    गुलों के साथ हम भी कुचले जाते
    मगर काँटों से था रिश्ता हमारा
    Himanshu Upadhyay Som
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    हरम दिल का न ख़ाली था हमारा
    रहा करता था इक शैदा हमारा

    उसी के ख़्वाब थे मन्ज़िल हमारी
    उसी की नींद थी रस्ता हमारा

    तुम्हारे साथ जब ये हाल है तो
    तुम्हारे बा'द क्या होगा हमारा

    जहाँ पर साथ छोड़ा हम सेफ़र ने
    वहीं पर रुक गया रस्ता हमारा

    ग़ज़ल कैसे मुकम्मल ये करें हम
    मुआ मतला नहीं बनता हमारा

    किसी के दिल पे क़ाबू क्या करें हम
    हमीं पर बस नहीं चलता हमारा

    विकारों को गिराया हम ने जब तब
    बहुत ऊँचा उठा पलड़ा हमारा

    गुलों के साथ हम भी कुचले जाते
    मगर काँटों से था रिश्ता हमारा
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    Himanshu Upadhyay Som
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    दो पंख लगे होते तू साथ चला होता
    परवाज़ बयाँ होती आग़ाज़ नया होता

    रिश्ते मैं निभाने को कुछ और रुका होता
    नातों में अगर बाक़ी कुछ प्यार रहा होता

    उम्मीद-ए-वफ़ा तुझ सेे मैं ने की नहीं होती
    तो ज़ख़्म मेरे दिल का गहरा न हुआ होता

    ऐसे न जले होते तब गाम ये जीवन के
    ख़्वाहिश के शरारों पर जो मैं न चला होता

    जो तू ने कभी मुझ को गुल नज़्र किया था इक
    कुछ बाब पलटने थे वो फूल मिला होता
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    Himanshu Upadhyay Som
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