कहूँ किस तरह मैं कि वो बे-वफ़ा है
    मुझे उस की मजबूरियों का पता है
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    ख़ुदा बचाए तिरी मस्त मस्त आँखों से
    फ़रिश्ता हो तो बहक जाए आदमी क्या है
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    दुश्मनों से प्यार होता जाएगा
    दोस्तों को आज़माते जाइए
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    भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम
    क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए
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    रात बाक़ी थी जब वो बिछड़े थे
    कट गई उम्र रात बाक़ी है
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    वही फिर मुझे याद आने लगे हैं
    जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं

    वो हैं पास और याद आने लगे हैं
    मोहब्बत के होश अब ठिकाने लगे हैं

    सुना है हमें वो भुलाने लगे हैं
    तो क्या हम उन्हें याद आने लगे हैं

    हटाए थे जो राह से दोस्तों की
    वो पत्थर मिरे घर में आने लगे हैं

    ये कहना था उन से मोहब्बत है मुझ को
    ये कहने में मुझ को ज़माने लगे हैं

    हवाएँ चलीं और न मौजें ही उट्ठीं
    अब ऐसे भी तूफ़ान आने लगे हैं

    क़यामत यक़ीनन क़रीब आ गई है
    'ख़ुमार' अब तो मस्जिद में जाने लगे हैं
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    वही फिर मुझे याद आने लगे हैं
    जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं
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    इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए
    दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए

    भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम
    क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए

    आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए
    अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए

    जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ
    सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए

    वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है
    आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए

    हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह
    हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए

    हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार'
    तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
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    तेरे दर से जब उठ के जाना पड़ेगा
    ख़ुद अपना जनाज़ा उठाना पड़ेगा
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    ये कहना था उन से मोहब्बत है मुझ को
    ये कहने में मुझ को ज़माने लगे हैं
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