न रूई हो तो अपने अश्कों से बाती बनाएँगे
    बुझा दीया हमारा तो हवा से लड़ भी जाएँगे

    बनाई रोज़ चौदह साल रंगोली बस इस ख़ातिर
    न जाने रामजी वनवास से कब लौट आएंँगे
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    Krishnakant Kabk
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    तुम्हारे साथ मुझ को चाय पीना है मगर
    ये भी है शर्त कप सिर्फ़ एक होना चाहिए
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    मैं कहूँ भी तो कैसे कहूँ अब ग़ज़ल
    शे'र भी मेरे तन्हा हैं मेरी तरह
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    ज़रा सा हाथ लगने से हो जाते ज़ख़्म सारे ठीक
    तेरे हाथों में जादू है तू चारासाज़ थोड़ी है
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    मोहब्बत से मोहब्बत मिल गई जैसे
    कि सहरा में कली इक खिल गई जैसे

    न जाने कैसे तुम बिन जी रहा था मैं
    समझ लो हर घड़ी मुश्किल गई जैसे
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    वो रस्मन पूछ लेती है कि मिलना या नहीं मिलना
    फिर इस के बा'द तो मिलना किसे अच्छा नहीं लगता
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    बुलाया शाम को लेकिन वहाँ मैं सुब्ह जा बैठा
    सुना था देर से आना उसे अच्छा नहीं लगता
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    मोहब्बत कर मोहब्बत कर यही बस कह रहा है दिल
    सुन अपने दिल की तू ये ग़ैर की आवाज़ थोड़ी है
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    हर गीत में हर बार गाऊँगा तुझे
    अपनी ग़ज़ल में गुनगुनाऊँगा तुझे

    तू ईद है और तू ही दीवाली मेरी
    मैं हर बरस यूँँही मनाऊँगा तुझे
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    Krishnakant Kabk
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    मोहब्बत से मोहब्बत मिल गई जैसे
    कि सहरा में कली इक खिल गई जैसे

    न जाने कैसे तुम बिन जी रहा था मैं
    समझ लो हर घड़ी मुश्किल गई जैसे

    चली थी रेल इक सीटी बजाए बिन
    जो मेरे दिल से तेरे दिल गई जैसे

    न निकला लफ़्ज़ उस के रू-ब-रू मेरा
    मेरे वो होंठ दोनों सिल गई जैसे

    ग़ज़ल को मेरी तू ने गुनगुनाया जब
    लगा मेरी हाँ में हाँ मिल गई जैसे

    उसे इतना क़रीबी क्यो बनाया 'कब्क'
    गया इक शख़्स तो महफ़िल गई जैसे
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    Krishnakant Kabk
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