मजबूरी ही, बाज़ीगर की हिम्मत है
    रस्सी पर चलते हैं, ध्यान सँभाले हम
    Moin Ahmed "Aazad"
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    मंदी में, महँगा सामान सँभाले हम
    बैठे हैं, दिल में अरमान सँभाले हम

    आँखों में सैलाब की, गर्दिश जारी है
    और सीने में, हैं तूफ़ान सँभाले हम

    होंठों पर मुस्कान सजाए, बैठे हैं
    कितने होंठों की मुस्कान सँभाले हम

    उल्फ़त के बाज़ार, में बेची बीनाई
    लौटे हैं, फिर भी नुक़सान सँभाले हम

    क़स्र मुबारक़ हो तुम को ये ख़ुशियों का
    अच्छे से हैं, दिल वीरान सँभाले हम

    मजबूरी ही, बाज़ीगर की हिम्मत है
    रस्सी पर चलते हैं, ध्यान सँभाले हम

    मतलब की इस दुनिया में भी जीते हैं
    जैसे-तैसे, अपनी जान सँभाले हम

    ज़र्द हुए पत्तों की क़िस्मत क्या आख़िर
    टूट गए शाख़ों का मान, सँभाले हम

    उस के कूचे में हर शख़्स ख़ुदा था सो
    लौट आए अपनी औसान सँभाले हम

    मज़लूमों की चीख़ें सुनते हैं 'आज़ाद'
    बहरों की बस्ती में, कान सँभाले हम
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    Moin Ahmed "Aazad"
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    आज़ाद हूँ मैं ठीक से पहचानिए मुझे
    बे-चेहरगी का आप की चेहरा रहा हूँ मैं
    Moin Ahmed "Aazad"
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    उल्फ़त की चोट आहो फ़ुग़ाँ सिसकियाँ तमाम
    वो मेरे नाम कर गए बेचैनियाँ तमाम

    ज़ेहन और जिगर में जब भी मचलते हैं ज़लज़ले
    तंग आ के चीख़ पड़तीं हैं ख़ामोशियाँ तमाम

    रक्खेंगे कब तलक मुझे यूँँ ही क़तार में
    सुन लीजिए हुज़ूर मेरी अर्ज़ियाँ तमाम

    नफ़रत को अपने क़ल्ब से बाहर निकालिए
    दरिया में फेंक आइए ये बर्छियाँ तमाम

    फूलों में तेरा रंग, हवाओं में है महक
    जलवों में तेरे जज़्ब हैं रानाइयाँ तमाम

    शायद अभी भी आप को फ़ुर्सत नहीं मिली
    रक्खी हैं ताक़चे पे मेरी चिट्ठियाँ तमाम

    मैं ने जो इक शजर की हिफ़ाज़त सँभाल ली
    मेरे ही सम्त हो गईं फिर आँधियाँ तमाम

    इक ख़्वाब देखता हूँ मैं आज़ाद रोज़ो-शब
    महफूज़ है वतन की मेरे बेटियाँ तमाम
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    Moin Ahmed "Aazad"
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    तन्हाई ही तन्हाई है, मौला ख़ैर करे
    ख़ाना-ए-दिल पर जो छाई है, मौला ख़ैर करे

    जानाँ तेरी यादों में अब अश्क बहाने की
    फिर ये आँख तमन्नाई है, मौला ख़ैर करे

    ज़ख़्म-ए-दिल है, मैं हूँ, और उदासी है हर-सू
    अब जान मेरी घबराई है मौला ख़ैर करे

    तेरी राहें तकते-तकते, मेरी आँखों की
    बुझने पर अब बीनाई है, मौला ख़ैर करे

    हाल न पूछा, उस ने मेरी ज़र्द तबीअत का
    यार भी मेरा हरजाई है, मौला ख़ैर करे

    मेरे सर इल्ज़ाम लगे हैं, तर्क-ए-उल्फत के
    मेरे हिस्से रुसवाई है, मौला ख़ैर करे

    याँ तो वो ही मुंसिफ़ भी है और क़ातिल भी है
    ज़ेर ए अदालत सुनवाई है, मौला ख़ैर करे

    बीमार-ए-उल्फ़त हूँ मैं आज़ाद, मगर ख़ुश हूँ,
    उस की हिम्मत-अफ़ज़ाई है, मौला ख़ैर करे
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    Moin Ahmed "Aazad"
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    काश कोई ग़ज़ल तो ऐसी हो
    वो जो बिल्कुल तुम्हारे जैसी हो
    Moin Ahmed "Aazad"
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    तेरे लिए ये जान भी क़ुर्बान है
    मेरी ग़ज़ल का बस तू ही उनवान है

    समझी नहीं उस ने ये बातें अन-कही
    मासूम है कितनी सनम नादान है

    मैं सोचता हूँ सब ख़यालों में तुझे
    जाऊँ जहाँ बस तेरा ही गुन-गान है

    सब नाम से तेरे बुलाते हैं मुझे
    अब नाम तेरा ये मेरी पहचान है

    आ जा ऐ जान-ए-जाँ न तड़पा यूँँ मुझे
    ये मेरा घर तेरे बिना सुनसान है

    "मोईन" को अच्छा कहो चाहे बुरा
    इस के लबों पे हर घड़ी मुस्कान है
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    Moin Ahmed "Aazad"
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    बस इक यही रिश्ता निभाना है मुझे
    अब उस की हाँ में हाँ मिलाना है मुझे

    देखे नहीं थे ख़्वाब मैं ने वस्ल के
    दिल हिज्र के लाइक़ बनाना है मुझे

    उस के लबों पर सेहरा की बातें हैं सो
    मजनू सिफ़त ख़ुद को बनाना है मुझे

    वो संग दिल है ये सभी को है ख़बर
    है मोम लहजा ये बताना है मुझे

    क्या रेल से आवाज़ देता है कोई
    क्या पटरियों पर लेट जाना है मुझे

    उस सेे वफ़ा की अब तवक़्क़ो भी नहीं
    अब ज़ख़्म दिल का ख़ुद छुपाना है मुझे

    दिल को अज़ाखाना बनाना है मेरे
    अब सोग यूँँ उस का मनाना है मुझे

    मोईन उस को तो तमाशे भाते हैं
    अंगारों की बारिश में आना है मुझे
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    Moin Ahmed "Aazad"
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    है हाल जो भी जैसा भी अब ठीक है
    मैं मर गया, अपनी कहो सब ठीक है
    Moin Ahmed "Aazad"
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    ग़मनाक मैं, बे-साज़ मैं, बर्बाद मैं
    ऐ दोस्त तू ख़ुश है अगर तब ठीक है
    Moin Ahmed "Aazad"
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