Nasir Kazmi

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    मुझे ये डर है तेरी आरज़ू न मिट जाए
    बहुत दिनों से तबीअत मिरी उदास नहीं
    Nasir Kazmi
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    जुदा हुए हैं बहुत लोग एक तुम भी सही
    अब इतनी बात पे क्या ज़िंदगी हराम करें
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    निय्यत-ए-शौक़ भर न जाए कहीं
    तू भी दिल से उतर न जाए कहीं

    आज देखा है तुझ को देर के ब'अद
    आज का दिन गुज़र न जाए कहीं

    न मिला कर उदास लोगों से
    हुस्न तेरा बिखर न जाए कहीं

    आरज़ू है कि तू यहाँ आए
    और फिर उम्र भर न जाए कहीं

    जी जलाता हूँ और सोचता हूँ
    राएगाँ ये हुनर न जाए कहीं

    आओ कुछ देर रो ही लें 'नासिर'
    फिर ये दरिया उतर न जाए कहीं
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    Nasir Kazmi
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    क़ुबूल है जिन्हें ग़म भी तेरी ख़ुशी के लिए
    वो जी रहे हैं हक़ीक़त में ज़िन्दगी के लिए
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    आज देखा है तुझ को देर के बा'द
    आज का दिन गुज़र न जाए कहीं
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    वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का
    जो पिछली रात से याद आ रहा है
    Nasir Kazmi
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    नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिए
    वो शख़्स तो शहर ही छोड़ गया मैं बाहर जाऊँ किस के लिए

    जिस धूप की दिल में ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई
    इन जलती बलती गलियों में अब ख़ाक उड़ाऊँ किस के लिए

    वो शहर में था तो उस के लिए औरों से भी मिलना पड़ता था
    अब ऐसे-वैसे लोगों के मैं नाज़ उठाऊँ किस के लिए

    अब शहर में उस का बदल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं
    ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुल-दान सजाऊँ किस के लिए

    मुद्दत से कोई आया न गया सुनसान पड़ी है घर की फ़ज़ा
    इन ख़ाली कमरों में 'नासिर' अब शम्अ' जलाऊँ किस के लिए

    अब शहर में उस का बदल ही नहीं कोई वैसा जान-ए-ग़ज़ल ही नहीं
    ऐवान-ए-ग़ज़ल में लफ़्ज़ों के गुल-दान सजाऊँ किस के लिए

    मुद्दत से कोई आया न गया सुनसान पड़ी है घर की फ़ज़ा
    इन ख़ाली कमरों में 'नासिर' अब शम्अ' जलाऊँ किस के लिए
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    Nasir Kazmi
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    वो साहिलों पे गाने वाले क्या हुए
    वो कश्तियाँ चलाने वाले क्या हुए

    वो सुब्ह आते आते रह गई कहाँ
    जो क़ाफ़िले थे आने वाले क्या हुए

    मैं उन की राह देखता हूँ रात भर
    वो रौशनी दिखाने वाले क्या हुए

    ये कौन लोग हैं मिरे इधर उधर
    वो दोस्ती निभाने वाले क्या हुए

    वो दिल में खुबने वाली आँखें क्या हुईं
    वो होंट मुस्कुराने वाले क्या हुए

    इमारतें तो जल के राख हो गईं
    इमारतें बनाने वाले क्या हुए

    अकेले घर से पूछती है बे-कसी
    तिरा दिया जलाने वाले क्या हुए

    ये आप हम तो बोझ हैं ज़मीन का
    ज़मीं का बोझ उठाने वाले क्या हुए
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    वक़्त अच्छा भी आएगा 'नासिर'
    ग़म न कर ज़िंदगी पड़ी है अभी
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    तेरी मजबूरियाँ दुरुस्त मगर
    तू ने वा'दा किया था याद तो कर
    Nasir Kazmi
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