किस की आँखों में समाए रहते हो
    इश्क़ की दुनिया बसाए रहते हो

    इक नज़र यूँँ मुस्कुरा के देखो भी
    दिल को तुम मेरे जलाए रहते हो
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    Naviii dar b dar
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    कुछ ग़म-ए-तन्हाई ले डूबी हमें
    इश्क़ की गहराई ले डूबी हमें

    निकले थे जिस को ही पाने यार तो
    उस की एक अँगड़ाई ले डूबी हमें
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    Naviii dar b dar
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    हर किसी को उत्तर भी देता है अपने शब्दों के वो
    ऐसा छोटा सा एक शाइ'र है वो अपने शहर का
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    बधाई और मिठाई में कटता दिन
    ये दिन सभी के लिए ख़ास होता है
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    मुझ सेे शिकवा ही कहाँ रक्खा है इस दुनिया ने
    बस इसी बात से मैं दिल को तसल्ली देता
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    तुम्हें हुनर तो मिला इश्क़ में यूँँ धोखे का
    हमें ज़माने लगेंगे यक़ीन करने को
    Naviii dar b dar
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    बंदिशों की बेड़ियों में जकड़े हो गर
    तुम भी तो हथियार क़लम को बना लो
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    तो कभी ये ज़मीं आसमाँ की तलब
    अब कहाँ ख़त्म होती जहाँ की तलब

    बात कह के गुज़ारी यूँँ ही रात भर
    इश्क़ को भी कहाँ अब गुमाँ की तलब

    आँख भी देखे जो और सिर ले झुका
    दिल को है ऐसे ही रहनुमा की तलब

    यार मुझ को कमी एक है खल रही
    ढूँढ़ता दिल तो है दास्ताँ की तलब

    वस्ल और हिज्र के कश्मकश में 'नवी'
    मुझ को तो एक ऐसे मकाँ की तलब
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    Naviii dar b dar
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    एक इश्क़ का भी यूँँ सवाब होगा
    तब हमारे हिस्से भी जवाब होगा

    नज़रें भी ये आख़िर तो चुनेगी किस को
    ये भी देखना तो लाजवाब होगा
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    Naviii dar b dar
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    बने इस प्यार में गुलफ़ाम क्या कीजे
    हुए इस इश्क़ में बदनाम क्या कीजे

    समुंदर से है रिश्ता दूरी साहिल से
    ये आँसू का है क़िस्सा आम क्या कीजे
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    Naviii dar b dar
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