Qabil Ajmeri

Top 10 of Qabil Ajmeri

    बहुत काम लेने हैं दर्द-ए-जिगर से
    कहीं ज़िन्दगी को क़रार आ न जाए
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    वक़्त करता है परवरिश बरसों
    हादिसा एक दम नहीं होता
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    हस्ती को अपनी शोला-ब-दामाँ करेंगे हम
    ज़िंदाँ में भी गए तो चराग़ाँ करेंगे हम

    बरहम हों बिजलियाँ कि हवाएँ ख़िलाफ़ हों
    कुछ भी हो एहतमाम-ए-गुलिस्ताँ करेंगे हम

    दामन की क्या बिसात गिरेबाँ है चीज़ क्या
    नज़र-ए-बहार नक़द-ए-दिल ओ जाँ करेंगे हम

    ज़ुल्मत से बे-कराँ तो उजाले भी कम नहीं
    हर दाग़-ए-दिल को आज फ़रोज़ाँ करेंगे हम

    अब देखते हैं कौन उड़ाता है रंग-ओ-बू
    अपना लहू शरीक-ए-बहाराँ करेंगे हम

    जिन को फ़रेब-ए-शौक़ में आना था आ चुके
    अब तो तिरे करम को पशीमाँ करेंगे हम
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    दिल-ए-दीवाना अर्ज़-ए-हाल पर माइल तो क्या होगा
    मगर वो पूछ बैठे ख़ुद ही हाल-ए-दिल तो क्या होगा

    हमारा क्या हमें तो डूबना है डूब जाएँगे
    मगर तूफ़ान जा पहुँचा लब-ए-साहिल तो क्या होगा

    शराब-ए-नाब ही से होश उड़ जाते हैं इंसाँ के
    तिरा कैफ़-ए-नज़र भी हो गया शामिल तो क्या होगा

    ख़िरद की रहबरी ने तो हमें ये दिन दिखाए हैं
    जुनूँ हो जाएगा जब रहबर-ए-मंज़िल तो क्या होगा

    कोई पूछे तो साहिल पर भरोसा करने वालों से
    अगर तूफ़ाँ की ज़द में आ गया साहिल तो क्या होगा

    ख़ुद उस की ज़िंदगी अब उस से बरहम होती जाती है
    उन्हें होगा भी पास-ए-ख़ातिर-ए-'क़ाबिल' तो क्या होगा
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    तुम्हें जो मेरे ग़म-ए-दिल से आगही हो जाए
    जिगर में फूल खिलें आँख शबनमी हो जाए

    अजल भी उस की बुलंदी को छू नहीं सकती
    वो ज़िंदगी जिसे एहसास-ए-ज़िंदगी हो जाए

    यही है दिल की हलाकत यही है इश्क़ की मौत
    निगाह-ए-दोस्त पे इज़हार-ए-बेकसी हो जाए

    ज़माना दोस्त है किस किस को याद रक्खोगे
    ख़ुदा करे कि तुम्हें मुझ से दुश्मनी हो जाए

    सियाह-ख़ाना-ए-दिल में है ज़ुल्मतों का हुजूम
    चराग़-ए-शौक़ जलाओ कि रौशनी हो जाए

    तुलू-ए-सुब्ह पे होती है और भी नमनाक
    वो आँख जिस की सितारों से दोस्ती हो जाए

    अजल की गोद में 'क़ाबिल' हुई है उम्र तमाम
    अजब नहीं जो मिरी मौत ज़िंदगी हो जाए
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    अब ये आलम है कि ग़म की भी ख़बर होती नहीं
    अश्क बह जाते हैं लेकिन आँख तर होती नहीं

    फिर कोई कम-बख़्त कश्ती नज़र-ए-तूफ़ाँ हो गई
    वर्ना साहिल पर उदासी इस क़दर होती नहीं

    तेरा अंदाज़-ए-तग़ाफ़ुल है जुनूँ में आज कल
    चाक कर लेता हूँ दामन और ख़बर होती नहीं

    हाए किस आलम में छोड़ा है तुम्हारे ग़म ने साथ
    जब क़ज़ा भी ज़िंदगी की चारा-गर होती नहीं

    रंग-ए-महफ़िल चाहता है इक मुकम्मल इंक़लाब
    चंद शम्ओं के भड़कने से सहर होती नहीं

    इज़्तिराब-ए-दिल से 'क़ाबिल' वो निगाह-ए-बे-नियाज़
    बे-ख़बर मालूम होती है मगर होती नहीं
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    तुम न मानो मगर हक़ीक़त है इश्क़ इंसान की ज़रूरत है
    जी रहा हूँ इस ए'तिमाद के साथ
    ज़िंदगी को मिरी ज़रूरत है

    हुस्न ही हुस्न जल्वे ही जल्वे
    सिर्फ़ एहसास की ज़रूरत है

    उस के वादे पे नाज़ थे क्या क्या
    अब दर-ओ-बाम से नदामत है

    उस की महफ़िल में बैठ कर देखो
    ज़िंदगी कितनी ख़ूब-सूरत है

    रास्ता कट ही जाएगा 'क़ाबिल'
    शौक़-ए-मंज़िल अगर सलामत है
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    तज़ाद-ए-जज़्बात में ये नाज़ुक मक़ाम आया तो क्या करोगे
    मैं रो रहा हूँ तुम हँस रहे हो मैं मुस्कुराया तो क्या करोगे

    मुझे तो इस दर्जा वक़्त-ए-रुख़्सत सुकूँ की तल्क़ीन कर रहे हो
    मगर कुछ अपने लिए भी सोचा मैं याद आया तो क्या करोगे

    अभी तो तन्क़ीद हो रही है मिरे मज़ाक़-ए-जुनूँ पे लेकिन
    तुम्हारी ज़ुल्फ़ों की बरहमी का सवाल आया तो क्या करोगे

    तुम्हारे जल्वों की रौशनी में नज़र की हैरानियाँ मुसल्लम
    मगर किसी ने नज़र के बदले जो दिल आज़माया तो क्या करोगे

    उतर तो सकते हो यार लेकिन मआल पर भी निगाह कर लो
    ख़ुदा-ना-कर्दा सुकून-ए-साहिल न रास आया तो क्या करोगे

    कुछ अपने दिल पर भी ज़ख़्म खाओ मिरे लहू की बहार कब तक
    मुझे सहारा बनाने वालो मैं लड़खड़ाया तो क्या करोगे

    अभी तो दामन छुड़ा रहे हो बिगड़ के 'क़ाबिल' से जा रहे हो
    मगर कभी दिल की धड़कनों में शरीक पाया तो क्या करोगे
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    वो कब आएँ ख़ुदा जाने सितारो तुम तो सो जाओ
    हुए हैं हम तो दीवाने सितारो तुम तो सो जाओ

    कहाँ तक मुझ से हमदर्दी कहाँ तक मेरी ग़म-ख़्वारी
    हज़ारों ग़म हैं अनजाने सितारो तुम तो सो जाओ

    गुज़र जाएगी ग़म की रात उम्मीदो तो जाग उट्ठो
    सँभल जाएँगे दीवाने सितारो तुम तो सो जाओ

    हमें रूदाद-ए-हस्ती रात भर में ख़त्म करनी है
    न छेड़ो और अफ़्साने सितारो तुम तो सो जाओ

    हमारे दीदा-ए-बे-ख़्वाब को तस्कीन क्या दोगे
    हमें लूटा है दुनिया ने सितारो तुम तो सो जाओ

    उसे 'क़ाबिल' की चश्म-ए-नम से देरीना तअ'ल्लुक़ है
    शब-ए-ग़म तुम को क्या जाने सितारो तुम तो सो जाओ
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    हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहाँ तक आ गए
    हम नज़र तक चाहते थे तुम तो जाँ तक आ गए

    ना-मुरादी अपनी क़िस्मत गुमरही अपना नसीब
    कारवाँ की ख़ैर हो हम कारवाँ तक आ गए

    उन की पलकों पर सितारे अपने होंटों पे हँसी
    क़िस्सा-ए-ग़म कहते कहते हम कहाँ तक आ गए

    ज़ुल्फ़ में ख़ुशबू न थी या रंग आरिज़ में न था
    आप किस की आरज़ू में गुल्सिताँ तक आ गए

    रफ़्ता रफ़्ता रंग लाया जज़्बा-ए-ख़ामोश-ए-इश्क़
    वो तग़ाफ़ुल करते करते इम्तिहाँ तक आ गए

    ख़ुद तुम्हें चाक-ए-गरेबाँ का शुऊ'र आ जाएगा
    तुम वहाँ तक आ तो जाओ हम जहाँ तक आ गए

    आज 'क़ाबिल' मय-कदे में इंक़लाब आने को है
    अहल-ए-दिल अंदेशा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ तक आ गए
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