हक़ीक़त में नहीं हूँ ख़ूबरू उतना
    मगर तस्वीर में अच्छा लगूँगा मैं
    Adnan Ali SHAGAF
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    अच्छा तो इश्क़ करना तुम ही हमें सिखा दो
    जैसा कि तुम कहोगे बस हू-ब-हू करेंगे
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    ख़ुदा के दर से तुझे इस अदास माँगा है
    कि हाथ उठा के नहीं सर झुका के माँगा है
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    कुछ कर नहीं रहे तो इक काम कीजिएगा
    बाँहों में आके मेरे आराम कीजिएगा
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    तुझ को पाने का मुझे यूँँ तो कोई शौक़ नहीं
    पास आने का मुझे यूँँ तो कोई शौक़ नहीं

    आप मैं दोस्त हैं इतना ही मुझे काफ़ी है
    दिल लगाने का मुझे यूँँ तो कोई शौक़ नहीं

    कि तेरे दर को फ़क़त दूर से तकता जाऊँ
    घर में आने का मुझे यूँँ तो कोई शौक़ नहीं

    बैठ कुछ बात करें बात सुनें शाम ढले
    नाच गाने का मुझे यूँँ तो कोई शौक़ नहीं

    यूँँ करें मुझ को मोहब्बत ही अता कर दें आप
    ज़हर खाने का मुझे यूँँ तो कोई शौक़ नहीं

    आप के तंज़ से कुछ सीख ही मिल जाती है
    डाँट खाने का मुझे यूँँ तो कोई शौक़ नहीं

    मैं कि उस्तादों के उस्तादों का उस्ताद 'शगफ़'
    हाँ जताने का मुझे यूँँ तो कोई शौक़ नहीं
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    Adnan Ali SHAGAF
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    ये कौन है जो ख़्वाब में मुझे सिखा रही ग़ज़ल
    मुझे नहीं पता कहाँ कहाँ से आ रही ग़ज़ल

    जफ़ा समेटते हुए मैं जब कभी बिखर गया
    तो हर्फ़ हर्फ़ जोड़कर मुझे बना रही ग़ज़ल

    सुनो तुम्हारी बातों में नशा नशा सा लग रहा
    तुम्हारे इन लबों पे जैसे मुस्कुरा रही ग़ज़ल

    कहाँ चली मता-ए-जाँ कि रुक ज़रा सा सब्र कर
    ये तेरी ख़ूबियाँ ही तो तुझे बता रही ग़ज़ल

    ये पहले हम ही शाइरों के रास्तों पे चल पड़ी
    पर अब ये अपनी राह ख़ुद हमें चला रही ग़ज़ल

    ज़बान की जहान में ये रेख़्ता सितारे हैं
    फिर इन सितारों के जहाँ में जगमगा रही ग़ज़ल

    बड़ी ही पुर कशिश सदा रवाँ है उस सेे जा-बजा
    कि "लहजा-ए-शगफ़" में जब वो गुनगुना रही ग़ज़ल
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    Adnan Ali SHAGAF
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    जाने कैसा बदन में जादू है
    देख ख़ुद पर न कोई क़ाबू है

    हर घड़ी तुझ को सोचते रहना
    इश्क़ में दिल तो एक साधू है

    तेरे ग़म से भरे समुंदर में
    तेरी यादों का एक टापू है

    जिस की तुम हो गई हो उल्फ़त में
    ठीक लड़का नहीं लड़ाकू है
    इश्क़ में किस तरह निभे उस सेे
    मैं हूँ अहमक़ मगर वो चालू है

    हिज्र के दिन के बा'द वो लड़का
    शे'र कहता है और निखट्टू है

    बड़ा मुश्किल है फैसले का सफ़र
    कँपकँपी हाथ में तराज़ू है

    मुझ सेे मत पूछ क्या बला है शगफ़
    ये कभी मैं हूँ तो कभी तू है
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    Adnan Ali SHAGAF
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    बुझे एहसास का पहलू उभारेगी
    वो जब आवाज़ से मुझ को पुकारेगी

    खुली जुल्फ़ें, झुकी पलकें, क़यामत चाल
    न जाने ये अदा अब किस को मारेगी

    मेरे होंठों पे रखके अपने होंठों को
    मेरी हर साँस में ख़ुशबू उतारेगी

    फ़लक के कुल मकीं उस को ही देखेंगे
    अभी वो बाम पर जुल्फ़ें सँवारेगी

    ख़ुदा उस शख़्स की आँखें बुझा डाले
    वो जिस के सामने कपड़े उतारेगी

    भले जितना ही कुछ कर लो मगर ये दिल
    इक ऐसी शय है जो हर वक़्त हारेगी
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    Adnan Ali SHAGAF
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    ये तेरा हुस्न उफ़ पल पल मुझे घाइल ही करता है
    तेरे ही इश्क़ का बस है करम जो मैं कि ज़िंदा हूँ

    मुझे आवाज़ दे दे तो मैं आख़िर क्यूँ न आऊँगा
    अरे मैं तो तेरा पाला हुआ आशिक़ परिंदा हूँ
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    Adnan Ali SHAGAF
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    इतने गहरे काले गेसू
    कितने प्यारे प्यारे गेसू

    उस की तो किस्मत सँवरेगी
    जो भी तिरा सँवारे गेसू

    सब को तेरी आँखें मारे
    हम को तो बस मारे गेसू

    चेहरा जैसे चाँद का टुकड़ा
    इनको और निखारे गेसू

    कितनी सुंदर लगती तुम पर
    घुँघराले-घुँघराले गेसू

    बिल्कुल तुझ सेा रखने वाला
    मैं भी अपने सारे गेसू

    खु़द ही खु़द में निखरा जाए
    'शगफ़' तिरा जो निहारे गेसू
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    Adnan Ali SHAGAF
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