मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है
    क्या मिरे हक़ में फ़ैसला देगा
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    तेरे जाने में और आने में
    हम ने सदियों का फ़ासला देखा
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    ज़िक्र जब होगा मोहब्बत में तबाही का कहीं
    याद हम आएँगे दुनिया को हवालों की तरह
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    कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया
    और कुछ तल्ख़ी-ए-हालात ने दिल तोड़ दिया

    हम तो समझे थे के बरसात में बरसेगी शराब
    आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया

    दिल तो रोता रहे और आँख से आँसू न बहे
    इश्क़ की ऐसी रिवायात ने दिल तोड़ दिया

    वो मिरे हैं मुझे मिल जाएँगे आ जाएँगे
    ऐसे बेकार ख़यालात ने दिल तोड़ दिया

    आप को प्यार है मुझ से कि नहीं है मुझ से
    जाने क्यूँँ ऐसे सवालात ने दिल तोड़ दिया
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    इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया
    वर्ना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया

    आप कहते थे कि रोने से न बदलेंगे नसीब
    उम्र भर आप की इस बात ने रोने न दिया

    रोने वालों से कहो उन का भी रोना रो लें
    जिन को मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया

    तुझ से मिल कर हमें रोना था बहुत रोना था
    तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया

    एक दो रोज़ का सदमा हो तो रो लें 'फ़ाकिर'
    हम को हर रोज़ के सदमात ने रोने न दिया
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    आदमी आदमी को क्या देगा
    जो भी देगा वही ख़ुदा देगा

    मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है
    क्या मेरे हक़ में फ़ैसला देगा

    ज़िन्दगी को क़रीब से देखो
    इस का चेहरा तुम्हें रुला देगा

    हम सेे पूछो दोस्ती का सिला
    दुश्मनों का भी दिल हिला देगा

    इश्क़ का ज़हर पी लिया 'फ़ाकिर'
    अब मसीहा भी क्या दवा देगा
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    पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसाँ पाए हैं
    तुम शहर-ए-मोहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आए हैं
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    ज़िंदगी तुझ को जिया है कोई अफ़्सोस नहीं
    ज़हर ख़ुद मैं ने पिया है कोई अफ़्सोस नहीं

    मैं ने मुजरिम को भी मुजरिम न कहा दुनिया में
    बस यही जुर्म किया है कोई अफ़्सोस नहीं

    मेरी क़िस्मत में लिखे थे ये उन्हीं के आँसू
    दिल के ज़ख़्मों को सिया है कोई अफ़्सोस नहीं

    अब गिरे संग कि शीशों की हो बारिश 'फ़ाकिर'
    अब कफ़न ओढ़ लिया है कोई अफ़्सोस नहीं
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    पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसाँ पाए हैं
    तुम शहर-ए-मोहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आए हैं

    बुत-ख़ाना समझते हो जिस को पूछो न वहाँ क्या हालत है
    हम लोग वहीं से लौटे हैं बस शुक्र करो लौट आए हैं

    हम सोच रहे हैं मुद्दत से अब उम्र गुज़ारें भी तो कहाँ
    सहरा में ख़ुशी के फूल नहीं शहरों में ग़मों के साए हैं

    होंठों पे तबस्सुम हल्का सा आँखों में नमी सी है 'फ़ाकिर'
    हम अहल-ए-मोहब्बत पर अक्सर ऐसे भी ज़माने आए हैं
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    आप कहते थे कि रोने से न बदलेंगे नसीब
    उम्र भर आप की इस बात ने रोने न दिया
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