Tabish Dehlvi

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    जिन पे होता है बहुत दिल को भरोसा 'ताबिश'
    वक़्त पड़ने पे वही लोग दग़ा देते हैं
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    दोस्त क्या ख़ूब वफ़ाओं का सिला देते हैं
    हर नए मोड़ पर एक ज़ख़्म नया देते हैं

    तुम से तो ख़ैर घड़ी-भर की मुलाक़ात रही
    लोग सदियों की रफ़ाक़त को भुला देते हैं

    कैसे मुमकिन है कि धुआँ भी न हो और दिल भी जले
    चोट पड़ती है तो पत्थर भी सदा देते हैं

    कौन होता है मुसीबत में किसी का ऐ दोस्त
    आग लगती है तो पत्ते भी हवा देते हैं

    जिन पे होता है बहुत दिल को भरोसा 'ताबिश'
    वक़्त पड़ने पे वही लोग दग़ा देते हैं
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    हर इक दाग़-ए-दिल शम्अ'' साँ देखता हूँ
    तिरी अंजुमन ज़ौ-फ़िशाँ देखता हूँ

    तअ'य्युन से आज़ाद हैं मेरे सज्दे
    जबीं पर तिरा आस्ताँ देखता हूँ

    फ़रेब-ए-तसव्वुर है क़ैद-ए-क़फ़स है
    हर इक शाख़ पर आशियाँ देखता हूँ

    मैं राह-ए-तलब का हूँ पसमाँदा रह-रव
    ग़ुबार-ए-रह-ए-कारवाँ देखता हूँ

    ब-अंदाज़ा-ए-ज़ौक़-ए-ईज़ा-पसंदी
    उसे आज मैं मेहरबाँ देखता हूँ

    पिला कर मुझे महरम-ए-होश रक्खा
    ये ए'जाज़-ए-पीर-ए-मुग़ाँ देखता हूँ

    मिरी ज़िंदगी महरम-ए-ग़म है 'ताबिश'
    नफ़स को ब-रंग-ए-फ़ुग़ाँ देखता हूँ
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    पाबंदी-ए-हुदूद से बेगाना चाहिए
    दामाँ ब-क़द्र-ए-वहशत-ए-दीवाना चाहिए

    होता है फ़ाश गिर्या-ए-पैहम से राज़-ए-इश्क़
    ऐ शम्अ'' राज़-दारी-ए-परवाना चाहिए

    ज़ौक़-ए-उबूदियत है तअ'य्युन से बे-नियाज़
    हम-सूरत-ए-जबीं दर-ए-जानाना चाहिए

    बज़्म-ए-नियाज़-ए-इश्क़ में हूँ आश्ना-ए-होश
    बे-पर्दा आज फिर रुख़-ए-जानाना चाहिए

    ऐ ज़ौक़-ए-इज्ज़ जल्वा-गह-ए-यार है क़रीब
    पा-ए-तलब में लग़्ज़िश-ए-मस्ताना चाहिए

    'ताबिश' ग़म-ए-हयात ही वज्ह-ए-नशात है
    हर एक दाग़ सूरत-ए-पैमाना चाहिए
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    एक जल्वा ब-सद अंदाज़-ए-नज़र देख लिया
    तुझ को ही देखा किए तुझ को अगर देख लिया

    जैसे सर फोड़ के मिल जाएगी ज़िंदाँ से नजात
    क्या जुनूँ ने कोई दीवार में दर देख लिया

    बाज़ है आज तलक दीदा-ए-हैराँ की तरह
    दश्त-ए-वहशत ने किसे ख़ाक-बसर देख लिया

    जुर्म-ए-नज़्ज़ारा की पाता है सज़ा दिल अब तक
    अहल-ए-दिल देख लिया अहल-ए-नज़र देख लिया

    सूरत-ए-नक़्श-ए-क़दम दीदा-ए-मुश्ताक़ हैं हम
    जब भी वो आया सर-ए-राहगुज़र देख लिया

    यही हसरत है कि वो एक नज़र देख तो ले
    और उस ने कभी इस सम्त अगर देख लिया

    कहीं पर्दा है तजल्ली कहीं जल्वा है हिजाब
    ये तमाशा भी तिरा ज़ौक़-ए-नज़र देख लिया

    रोज़ इक ताज़ा ग़म-ए-दहर है नाज़िल 'ताबिश'
    एक तूफ़ान-ए-बला ने मिरा घर देख लिया
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    ताबिश' हवस-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार कहाँ तक
    राहत से ये ग़म फिर भी मिरे यार कहाँ तक

    हर रोज़ इक आवाज़ा अनल-हक़ का लगाएँ
    देखें तो कि है सिलसिला-ए-दार कहाँ तक

    हर रास्ते से मंज़िल-ए-हस्ती है बहुत दूर
    जाएगा मिरे साथ ग़म-ए-यार कहाँ तक

    हाँ ताना-ए-अग़्यार के नश्तर ही से खुल जाए
    इक ज़ख़्म रहेगा लब-ए-गुफ़्तार कहाँ तक

    हैं इस के तअ'ल्लुक़ से अज़ीज़ अहल-ए-जहाँ भी
    ले जाएगी आख़िर हवस-ए-यार कहाँ तक

    आईना-दर-आईना दर-आईना तिरा हुस्न
    हैराँ हों तिरे तालिब-ए-दीदार कहाँ तक

    होती ही नहीं सुब्ह-ए-क़यामत भी नुमूदार
    जागेंगे शब-ए-हिज्र के बीमार कहाँ तक

    फैली हुई हर सम्त कड़ी धूप है 'ताबिश'
    जाएगा कोई साया-ए-दीवार कहाँ तक
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    हमा-तन गोश इक ज़माना था
    मेरे लब पर तिरा फ़साना था

    काश दिल ही ज़रा ठहर जाता
    गर्दिशों में अगर ज़माना था

    हम थे और ए'तिमाद-ए-फ़स्ल-ए-बहार
    शाख़ शाख़ अपना आशियाना था

    वो बहारें भी हम पे गुज़री हैं
    जब क़फ़स था न आशियाना था

    दिल की उम्मीदवारियाँ न गईं
    उस करम का कोई ठिकाना था

    सुब्ह से पहले बुझ गया 'ताबिश'
    एक दिल ही चराग़-ए-ख़ाना था
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    सब ने मुझ ही को दर-ब-दर देखा
    बे-घरी ने मिरा ही घर देखा

    बंद आँखों से देख ली दुनिया
    हम ने क्या कुछ न देख कर देखा

    कहीं मौज नुमू रुकी तो नहीं
    शाख़ से फूल तोड़ कर देखा

    ख़ुद भी तस्वीर बन गई नज़रें
    एक सूरत को इस क़दर देखा

    हम ने उस ने हज़ार शेवा को
    कितनी नज़रों से इक नज़र देखा

    अब नुमू पाएँगे दिलों के ज़ख़्म
    हम ने इक फूल शाख़ पर देखा
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    देखिए अहल-ए-मोहब्बत हमें क्या देते हैं
    कूचा-ए-यार में हम कब से सदा देते हैं

    रोज़ ख़ुशबू तिरी लाते हैं सबा के झोंके
    अहल-ए-गुलशन मिरी वहशत को हवा देते हैं

    मंज़िल-ए-शम्अ तक आसान रसाई हो जाए
    इस लिए ख़ाक पतंगों की उड़ा देते हैं

    सू-ए-सहरा भी ज़रा अहल-ए-ख़िरद हो आओ
    कुछ बहारों का पता आबला-पा देते हैं

    मुझ को अहबाब के अल्ताफ़-ओ-करम ने मारा
    लोग अब ज़हर के बदले भी दवा देते हैं

    साथ चलता है कोई और भी सू-ए-मंज़िल
    मुझ को धोका मिरे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा देते हैं

    ज़िंदगी मर्ग-ए-मुसलसल है मगर ऐ 'ताबिश'
    हाए वो लोग जो जीने की दुआ देते हैं
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    नफ़स की ज़द पे हर इक शोला-ए-तमन्ना है
    हवा के सामने किस का चराग़ जलता है

    तिरा विसाल तो किस को नसीब है लेकिन
    तिरे फ़िराक़ का आलम भी किस ने देखा है

    अभी हैं क़ुर्ब के कुछ और मरहले बाक़ी
    कि तुझ को पा के हमें फिर तिरी तमन्ना है
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    Tabish Dehlvi
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