RAAHI

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    किताब है ज़िंदगी मैं पन्ना यहाँ नया लेने आ गया हूँ
    सफ़र का राही मैं आपसे एक तज़रुबा लेने आ गया हूँ
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    मिले उस को ज़रा दिल तोड़ने वाला बराबर है
    अकेली वो नहीं दुनिया कि इकलौती सितमगर है

    मुकर्रर हो रही है शा'इरी बस नाम से तेरे
    ज़माने को नहीं मालूम कितना दर्द अंदर है

    अदब वाले बचे इस शहर में अब कौन है बोलो
    यहाँ हर शख़्स के भीतर छिपा अपना समुंदर है

    ज़रा सी इक झलक पा के फ़क़त शीशे में खिलजी ने
    कहा पद्मावती नायाब अलबेली सी सुंदर है

    किसी को याद कर के पन्ने भरता आजकल राही
    सुना चर्चा है महफ़िल में बड़ा अच्छा सुखन-वर है
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    दो लफ़्ज़ शा'इरी की बदल कर चुरा लिया
    बारात ला, रक़ीब ने अपना बना लिया

    चक्कर लगा लगा के भी मेरी नहीं हुई
    मंडप के सात फेरे से रिश्ता बना लिया
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    मेरा रकी़ब ही तो मेरा हबीब है अब
    मेरे सनम का वो अब चाहत जो हो गया है
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    उस के बिना मरना नहीं आया मुझे
    वो जी रहे है किस तरह मेरे बिना
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    सुनो तुम आई थी क्या छत तरफ़ दिलबर
    मुहल्ले में सुना कल ईद होनी है
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    तरन्नुम में ग़ज़ल कहने नहीं आया
    दिखावा हम सेे होता ही नहीं यारों
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    मैं बुरा ही सही पर सही तो रहा
    तुम सही होते होते ग़लत हो गए
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    न पूछो हाल तुम क्या है तुम्हारे थे तुम्हारे हैं
    यही दिल ने बताया है तुम्हारे थे तुम्हारे हैं
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    कि बाहों में तराने थे कभी हम भी दीवाने थे
    मोहब्बत के ज़माने थे कभी हम भी दीवाने थे
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