Aakash Giri

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    तलाश रात गए रोकनी पड़ीं उन को
    के लाश फेंक दी हम ने वहीं कहीं अपनी
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    बस मुझे रब्त इसी बात से रखना होगा
    तुम कहो चुप मुझे ख़ामोश ही होना होगा

    हम सितम देख नहीं पाते सहेंगे कैसे
    जब हमें साथ किसी और के रहना होगा

    नाव में दूर सफ़र लोग नहीं करते अब
    जानते हैं की अगर डूबे तो मरना होगा
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    उम्र भर मेरी उदासी के लिए काफ़ी है
    जो सबब मेरी ख़मोशी के लिए काफ़ी है

    जान दे देंगे अगर आप कहेंगे हम सेे
    जान देना ही मुआ'फ़ी के लिए काफ़ी है
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    देखे जो भी तुम्हें वो कहेगा कि आप की
    नथुनी में बात है जो वो कंगन में है नहीं
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    हो गया हूँ मैं भी शामिल उदास लोगों में
    लगने लग गया है अब दिल उदास लोगों में

    ये जमात तो है बस अक़्ल-मंद लोगों की
    होते ही नहीं है जाहिल उदास लोगों में

    बात ही नहीं करते सब ख़मोश रहते हैं
    दिन गुज़ारना है मुश्किल उदास लोगों में

    इंतिज़ार में बैठे लोग सब तुम्हारे है
    फूल की तरह जा कर खिल उदास लोगों में

    कैसे कह दिया है सिगरेट को बुरा तुम ने
    इस नशे के है सब काइल उदास लोगों में

    भर गई है पूरी दुनिया उदास लोगों से
    एक मैं ही हूँ बस ख़ुश दिल उदास लोगों में

    क़त्ल ख़ुद का करते हैं वो भी अपने हाथों से
    सब भरे पड़े है क़ातिल उदास लोगों में
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    तुम बचाकर भी मुझे छोड़ोगे तन्हा इस लिए
    मैं हूँ जिस भी हाल में मुझ को उसी में छोड़ दो
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    तेरे बस में जो भी कुछ है वो सभी बर्बाद कर
    मैं ने जैसे की है वैसे ज़िंदगी बर्बाद कर

    इस घड़ी दो काम कर सकता है तू हर हाल में
    चूमना है चूम ले! या तीरगी बर्बाद कर
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    तिरे बा'द इस फ़न का क्या ही करेंगे
    सुख़न छोड़ देंगे यही तय किया है
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    मैं ग़ज़ल कहता हूँ जिस के काफ़िया हैं राम जी
    शा'इरी में इक नया सा ज़ाविया हैं राम जी

    लड़ रही अंदर ही अंदर युध्द जग के रीत से
    जो कभी हारी नहीं थी वो सिया हैं राम जी
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    जब आँख भर के आप को देखा लगा कि बस
    कह दूँ मैं आपसे तभी अच्छा लगा कि बस

    कहता रहा था वो भी मिरा साथ देगा पर
    जो इक ज़रा सा पैर में कांटा लगा कि बस

    अंदाज़ हम लगा ही नहीं सकते थे कभी
    इतना हसीन आप का चेहरा लगा कि बस

    मुझ को यक़ीन इश्क़ कि हर बात पर ही था
    फिर इस यक़ीन से मुझे धक्का लगा कि बस

    तुम ने मज़ाक़ में जो कहा छोड़ दो मुझे
    मुझ को मज़ाक़ भी तेरा ऐसा लगा कि बस

    मैं हारता नहीं किसी कीमत पे दिल के फिर
    माथे से उस के जा मेरा माथा लगा कि बस

    आकाश आज आप की बाहों में मर गया
    इक टूटता हुआ सा वो तारा लगा कि बस
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