Vikram Sharma

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    उदासी जैसे कि उस के बदन का हिस्सा है
    अधूरा लगता है वो शख़्स अगर उदास न हो
    Vikram Sharma
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    ये कैसे सानहे अब पेश आने लग गए हैं
    तेरे आग़ोश में हम छट-पटाने लग गए हैं

    बहुत मुमकिन है कोई तीर हम को आ लगेगा
    हम ऐसे लोग जो पंछी उड़ाने लग गए हैं

    हमारे बिन भला तन्हाई घर में क्या ही करती
    उसे भी साथ ही ऑफ़िस में लाने लग गए हैं

    बदन पर याद की बारिश के छींटे पड़ गए थे
    पराई धूप में उन को सुखाने लग गए हैं

    हवा के एक ही झोंके में ये फल गिर पड़ेंगे
    ये बूढे पेड़ के कंधे झुकाने लग गए हैं

    नज़र के चौक पे बारिश झमाझम गिर रही है
    तो दिल के रूम में गाने पुराने लग गए हैं
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    Vikram Sharma
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    सोचता हूँ कि दिल-ए-ज़ार का मतलब क्या है
    एक हँसते हुए बीमार का मतलब क्या है

    आप कहते हैं कि दीवार गिरा दी जाए
    आप की नज़रों में दीवार का मतलब क्या है

    आख़िरी फ़ैसला तुम अपने मुताबिक़ लोगे
    फिर मेरी हामी या इनकार का मतलब क्या है

    संग-दिल लोगों से क्या अपनी तबीअ'त कहते
    किसी दीवार से गुफ़्तार का मतलब क्या है

    उठ के जा सकते हैं हम ऐसों के साए से आप
    हम समझते हैं कि अश्जार का मतलब क्या है

    पहले पहले तो फ़क़त ज़ब्त के इम्कान रहे
    रफ़्ता रफ़्ता खुला इज़हार का मतलब क्या है

    मैं कि चुप ज़ात था सो शे'र कहा करता था
    पूछ लेती थी वो अश'आर का मतलब क्या है
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    मिरी आदत है मैं हर राहबर से बात करता हूँ
    गुज़रता हूँ जो रस्ते से शजर से बात करता हूँ

    मैं तुझ से बात करने को तिरे किरदार में आ कर
    इधर से फ़ोन करता हूँ उधर से बात करता हूँ

    मैं तेरे साथ तो घर में बड़ा ख़ामोश रहता था
    नहीं मौजूद तू घर में तो घर से बात करता हूँ

    ख़िज़ाँ का कोई मंज़र मेरे अंदर रक़्स करता है
    कभी जो बन में गुल से या समर से बात करता हूँ

    सुख़न के फ़न को ऐसे ही तो ज़ाएअ'' कर नहीं सकता
    सो मैं ख़ुद से या फिर अहल-ए-नज़र से बात करता हूँ
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    तुम मुहब्बत से नहीं मुझ सेे ख़फ़ा हो शायद
    तुम अगर चाहो तो पिंजरा भी बदल सकते हो

    मुंतज़िर हूँ मैं सो नंबर भी नहीं बदलूँगा
    और तुम शहर का नक़्शा भी बदल सकते हो
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    उम्र के आख़िरी मक़ाम में हम
    मिल भी जाए तो क्या ख़ुशी होगी

    क्या सितम तुम को देखने के लिए
    हम को दुनिया भी देखनी होगी
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    जो भी होना था हो गया छोड़ो
    अब मैं चलता हूँ रास्ता छोड़ो

    अब तो दुनिया भी देख ली तुम ने
    अब तो ख़्वाबों को देखना छोड़ो
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    Vikram Sharma
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    वक़्त का दरिया तो हम पार नहीं कर सकते
    करना चाहे भी तो हम यार नहीं कर सकते!

    भूल जाना भी कोई काम हुआ करता है?
    काम ये आप के बीमार नहीं कर सकते!

    क्यूँँ सदा ढूँढ़ने होते है बहाने हम को
    क्यूँँ कभी खुल के हम इनकार नहीं कर सकते?
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    Vikram Sharma
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    अहले दुनिया नया नया हूँ मैं
    माज़रत, ख़्वाब देखता हूँ मैं

    उस की तस्वीर है घड़ी के पास
    हर घड़ी वक़्त देखता हूँ मैं

    इस क़दर तीरगी का क़ाइल हूँ
    धूप को धूप कह रहा हूँ मैं

    है परिंदों से ख़ामुशी दरकार
    पेड़ से बात कर रहा हूँ मैं
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    Vikram Sharma
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    जिन से उठता नहीं कली का बोझ
    उन के कंधों पे ज़िन्दगी का बोझ

    वक़्त जब हाथ में नहीं रहता
    किस लिए हाथ पर घड़ी का बोझ
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    Vikram Sharma
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