Aditya

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    मोहब्बत हो या हो दुश्मन ग़ुलामी हम नहीं करते
    झुकाने की जहाँ ज़िद हो सलामी हम नहीं करते
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    शाम होने को है अब लौट के घर आ जाओ
    नौ-परिंदे की गुज़ारिश है कि पर आ आओ

    मुझ सेे नाराज़ हो नाराज़ बने रहना तुम
    रात होने से ज़रा पहले मगर आ जाओ

    एक मुद्दत से कोई दर पे मेरे आया नहीं
    शख़्स आए न अगर, कोई ख़बर आ जाओ

    कुछ दिनों से मेरी आँखें हैं बहुत ख़ाली सी
    इनको भरने के लिए दर्द-ए-जिगर आ जाओ

    रात आधी है मगर नींद नज़र आए नहीं
    सुब्ह की पहली किरण तुम ही नज़र आ जाओ
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    Aditya
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    तो फिर हम ना रहेंगे हम अगर तुम मुझ को मिल जाओ
    मेरे धुल जाएँ सारे ग़म अगर तुम मुझ को मिल जाओ

    हर इक मौसम तुम्हारे बिन मुझे काँटे सा लगता है
    गुलों से खिल उठें मौसम अगर तुम मुझ को मिल जाओ

    ज़माने भर के ज़ख़्मों को मैं पल भर में भुला दूँगा
    ज़रूरी फिर नहीं मरहम अगर तुम मुझ को मिल जाओ

    मुझे डर है कि तुम को खो न दूँ इस भीड़ में इक दिन
    बदल जाएगा ये आलम अगर तुम मुझ को मिल जाओ

    तुम्हारा और मेरा एक हो जाना हो जाएगा
    इलाहाबाद का संगम अगर तुम मुझ को मिल जाओ

    उजाला चाँदनी का दिन में होगा और रातों में
    खिलेगी धूप भी मद्धम अगर तुम मुझ को मिल जाओ
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    Aditya
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    तुम से मुझ को सच्चा प्यार नहीं होता
    मुझ से ग़ज़लों का व्यापार नहीं होता

    मैं अपनी मस्ती में डूबा होता, गर
    मेरी नैया का मँझधार नहीं होता

    नफ़रत वालों की है ये दुनियादारी
    उल्फ़त वालों का संसार नहीं होता

    बाकी सब कुछ पैसों से मिल जाता है
    क़िस्मत का कोई बाज़ार नहीं होता

    तुम को सच्चे दोस्त कहाँ मिल जाते हैं
    मेरा कोई झूठा यार नहीं होता

    जिन के पास ज़बाँ का ख़ंजर होता है
    उन के हाथों में हथियार नहीं होता
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    बहुत सज धज के रहती हो कि जैसे उस ख़ुदा ने बस
    तुम्हीं पे रख दिया ज़िम्मा जहाँ के ख़ुश नज़ारों का

    तुम्हारी याद आते ही मेरे आँसू निकलते हैं
    वही रिश्ता है इनका भी जो है शब से सितारों का
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    मैं बहुत चुभने लगा हूँ तो करो ऐसा तुम
    छोड़ कर हाथ मेरा तुम भी किनारा कर लो
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    वक़्त गुजरा हुआ यादों में चला आता है
    वक़्त के साथ जो गुजरा वो कहाँ आता है

    रूठने और मनाने के रिवाजों से परे
    सिर्फ़ तन्हाई में जीने का मज़ा आता है
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    Aditya
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    तेरी हर इक निशानी मिट चुकी है
    बस इक तेरा दिया रुमाल बाकी

    मेरा अब हाल क्या तुम पूँछतीं हो
    मेरा कोई नहीं जब हाल बाकी
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    Aditya
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    तेरे ख़्वाबों ने मुझे चैन से सोने न दिया
    दूर नींदों से कहीं रात गुजारी मैं ने

    लौट कर आए जो घर शाम थके हारे तब
    झूट की इक हँसी चेहरे से उतारी मैं ने
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    Aditya
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    साथ तुम होते अगर तो बारिशों में भीगते
    या'नी हम तुम मौसमों की साजिशों में भीगते

    चाय का प्याला मैं होता चूमती जब तुम मुझे
    सुब्ह तेरे होंठों की आराइशों में भीगते

    जुस्तजू तेरी जो है वो ख़त्म हो जाती अगर
    साथ मिल कर इश्क़ की हम ख्वाहिशों में भीगते

    गर समझ लेते मुझे आसान होता ये सफ़र
    यूँ न हम तन्हाइयों की बंदिशों में भीगते
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    Aditya
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