Aqib khan

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    पहली सफ़ में जो खड़े हैं क़त्ल का इंसाफ लेने
    गर जो मुर्दा बोलता होता तो फिर सफ़ साफ होती
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    मन भर गया है मुझ सेे तो दिलबर बदल कर देख लो
    क्या एक ही दर पर रहोगे दर बदल कर देख लो

    इस
    में तो कोई शक नहीं हैं ख़ूब-सूरत आप पर
    मेरी तवज्जोह चाहिए तेवर बदल कर देख लो

    माँ बाप पर जो बोझ है आसान लगता है तुम्हें
    तुम उन की ज़िम्मेदारियाँ पल भर बदल कर देख लो

    इन चिंदियों के आने से कुछ भी न बिगड़ा है मेरा
    इक और मौका है कि तुम लश्कर बदल कर देख लो

    ये नौकरी आकिब तुम्हारे बस की बिल्कुल भी नहीं
    ये इश्क़ छोड़ो यार तुम दफ़्तर बदल कर देख लो
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    Aqib khan
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    तेरी गली में तो जाने का हौसला ही नहीं
    करूँँ मैं ज़ख़्म हरे फिर से सोचता ही नहीं

    अजीब राह है जिस पर हमें है जाना मगर
    कोई क़रीबी हमें आ के रोकता ही नहीं

    कि तेरे बा'द तो हम साथ साथ सब के गए
    वो और बात है ये दिल मिरा गया ही नहीं

    वो शख़्स जो सदा आँखों में है समाया हुआ
    मिला तो कह दिया मैं तुम को जानता ही नहीं

    ज़रा सा और दो ये दर्द कम पड़ा है मुझे
    कि साँस चल रही है अब भी मैं मरा ही नहीं

    रुके हुए थे इशारे पे एक जिस के वो फिर
    ये कह के चल दिया मुझ सेे मैं तेरा था ही नहीं

    बताया हिज्र के बारे में चारा-गर ने मुझे
    ये मर्ज़ ऐसा है जिस की कोई दवा ही नहीं
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    Aqib khan
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    यूँँ दिल से मेरे उतर गए तुम
    नहीं पता फिर किधर गए तुम

    न ढूँढों ख़ुद को यूँँ मेरे भीतर
    यक़ीन मानो कि मर गए तुम

    तुम्हारा क्या है पुराना छोड़ा
    नए शजर पर ठहर गए तुम

    तुम्हारे जैसा मिले तुम्हें और
    ख़बर हो मुझ को बिखर गए तुम

    वही हुनर अब सिखाओ मुझ को
    वो जैसे मुँह पर मुकर गए तुम

    मैं कितना झूठा था कहता था जो
    कि मर मिटूँगा अगर गए तुम

    दिलाओ जितना मगर कभी भी
    यक़ीं न होगा सुधर गए तुम

    अदा करो शुक्रिया मेरा अब
    थी मेरी सोहबत सँवर गए तुम
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    तेरा मिलना मेरी तकदीर में लिक्खा था मगर
    तेरा होना मेरी तकदीर में लिक्खा न गया
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    क्यूँ मुझे कुछ भी यहाँ अच्छा नहीं लगता है अब
    सच कहूँँ तो ये जहाँ अच्छा नहीं लगता है अब

    उम्र भर हम साथ हैं ये तो न बोलो मुझ सेे तुम
    झूठा वा'दा जान ए जाँ अच्छा नहीं लगता है अब

    हो अगर कुछ काम तो फिर बात भी कर लेंगे हम
    इश्क़ का चर्चा मियाँ अच्छा नहीं लगता है अब

    कुछ ख़बर अब तक नहीं है जाना है हम को कहाँ
    चलना ऐसे राएगाँ अच्छा नहीं लगता है अब

    चाँद तारों के बराबर बोला था इक शख़्स को
    सो चमकता आसमाँ अच्छा नहीं लगता है अब

    वक़्त की ही बात है जो मेरे पीछे थे कभी
    उन को मेरा कारवाँ अच्छा नहीं लगता है अब
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    समुंदर में भी सहरा देखना है
    मुझे महफ़िल में तन्हा देख लेना
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    ये दुनिया बुरी है बहुत ही बुरी है
    हैं हम जितने अच्छे ये उतनी बुरी है
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    मेरी बेचैनी का आलम मेरी बेचैनी से पूछो
    मेरे चहरे से पूछोगे कहेगा ठीक है सब कुछ
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    मुझे तो चाहिए तुम प्यार से बस बात कर लो
    मेरी तो यार कोई और भी ख़्वाहिश नहीं है
    Aqib khan
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