Amol

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    लगा हूँ जो मैं खर्चे अब मेरे घर के उठाने में
    लगेगा उम्र-भर क्या बाप के आधा कमाने में
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    कौन चाहेगा तुझे अब इस तरह से
    के मैं चाहूँ तो तुझे भी ना ख़बर हो
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    समुंदर बनाता या साहिल बनाता
    मैं क़तरा किसी के तो काबिल बनाता

    सफ़र काश होता मुकम्मल, मुझे गर
    कभी रास्ता अपनी मंज़िल बनाता
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    ग़मों को मिरे जो गिना जा रहा हैं
    कि मशग़ूल हो के सुना जा रहा हैं

    मिरी हैं ये किस्मत या फिर सजा हैं
    कि क़ातिल मुझी से चुना जा रहा हैं
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    जल रहा ज़ख़्म हैं और मरहम नहीं
    बात ये भी हैं इस बात का ग़म नहीं
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    दिल को अभी करार है
    ग़म आजकल फ़रार है

    कोई भी आता जाता है
    दिल में कहीं दरार है

    महँगी बड़ी है कैफियत
    सपने पड़े उधार है

    मेरी जो सिर्फ़ यार थी
    उस को मुझी से प्यार है

    पूछा जो हाल उस ने है
    कह दो कि अब सुधार है

    ये ज़िन्दगी है बे-वफा
    जीना यहाँ खुमार है
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    हादसा कल रात मेरे साथ ऐसा हो गया
    चूम कर मैं होंठ उस के और प्यासा हो गया
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    अब हमें इस सफ़र से निकलना हैं
    कुछ दिनों बा'द घर से निकलना हैं

    हैं नदामत इलाही , रहम बरसा
    इस ख़ुदा-ए-कहरस निकलना हैं

    चूम लूँ हाथ बे- ख़ौफ़ उस के बस
    ऐ वबा तेरे डर से निकलना हैं

    रात के ख़्वाब जो याद देती हैं
    बस मुझे उस सहरस निकलना हैं

    याद कूचा -ए- जाँ पाँव को आए
    अब मुझे इस शहर से निकलना हैं

    तू हैं 'दीदार' , वो मुंतज़िर फिर भी ?
    बद-अहद इस नजर से निकलना हैं
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    हवा को ख़रीद'ने के लाले पडे हैं
    हमारे कयामत से पाले पड़े हैं

    हैं खायी वतन ने बहुत ठोकरें भी
    मगर इस दफा पा में छाले पड़े हैं

    अचानक लगी आग शमशान में क्या
    कि इतनें शहर में उजाले पड़े हैं

    निभाते नहीं तुम रँलीओं के वादे
    तुम्हारी जबानों पें ताले पड़े हैं

    हुआ हैं बड़ा अर्सा दोस्तों से मिल के
    हैं ख़ाली खनकते जो प्याले पड़े हैं

    सबब और फिर क्या जुदाई का पूछूँ
    कि कानों से झुमके निकाले पडे हैं
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    हवा को ख़रीद'ने के लाले पडे हैं
    हमारे कयामत से पाले पड़े हैं
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