Anis shah anis

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    वो मेरी ज़िंदगी से कुछ ऐसे ग़ुजर गया
    इक फूल शाख़ से गिरा गिर कर बिखर गया

    मैं सोचता था हर्फ़-ए-दुआ से असर गया
    रब की अता से दस्त-ए-तलब मेरा भर गया

    दौर-ए-ख़िज़ाँ में साथ ये तन्हाइयाँ रहीं
    आए समर तो पेड़ परिंदों से भर गया

    कब तक रहोगे मुब्तला ग़फ़लत की नींद में
    जागो कि अब तो सर से भी पानी गुज़र गया

    ऐसी घुटन कि साँस भी लेना हुआ मुहाल
    ये कौन इतना ज़हर हवाओं में भर गया

    हाकिम ने देखो छीन लिए ना तुम्हारे हाथ
    इनआम-ए-फ़न की चाह में दस्त-ए-हुनर गया

    आख़िर तेरी अना की बग़ावत में ऐ 'अनीस'
    दस्तार तो गई ही गई साथ सर गया
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    अभी तो इतना अँधेरा नज़र नहीं आता
    तो साथ क्यूँ मेरा साया नज़र नहीं आता

    इन आँखों से ये ज़माना तो देख सकता हूँ
    बस एक अपना ही चेहरा नज़र नहीं आता

    जब एक अंधा अँधेरे में देख लेता है
    मुझे उजालों में क्या क्या नज़र नहीं आता

    बँधी यक़ीन की पट्टी हमारी आँखों पर
    सो छल फ़रेब या धोका नज़र नहीं आता

    जो दिख रहे हैं वो चाबी के सब खिलौने हैं
    यहाँ तो कोई भी ज़िंदा नज़र नहीं आता

    तराशे बुत की जो ता'रीफ़ करते हैं उन को
    हमारे हाथ का छाला नज़र नहीं आता

    अभी तो फैली यहाँ धुंध इतनी नफ़रत की
    किसी को प्यार का रस्ता नज़र नहीं आता

    'अनीस' यूँँ तो हज़ारों से रोज़ मिलता हूँ
    मगर मुझे कोई तुम सा नज़र नहीं आता
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    मैं भटकता ही रहा दश्त-ए-शनासाई में
    कोई उतरा ही नहीं रूह की गहराई में

    क्या मिलाया है बता जाम-ए-पज़ीराई में
    ख़ूब नश्शा है तेरी हौसला-अफ़जाई में

    तेरी यादों की सुई, प्रेम का धागा मेरा
    काम आए हैं बहुत ज़ख़्मों की तुरपाई में

    डस रही है ये सियह-रात की नागिन मुझ को
    भर रही ज़हर-ए-ख़मोशी, रग-ए-तन्हाई में

    सुर्मा-ए-मक्र-ओ-फ़रेब आँखों में जब से है लगा
    तब से है ख़ूब इज़ाफ़ा हद-ए-बीनाई में

    फ़िक्र-ओ-फ़न, रंग-ए-तग़ज़्ज़ुल, न ग़ज़ल की ख़ुशबू
    बस लगा रहता हूँ मैं क़ाफ़िया-पैमाई में

    सीख पानी से हुनर काम 'अनीस' आएगा
    दौड़ कर ख़ुद ही चला आता है गहराई में
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    गला ही घोंट देता है वो अपनी तिश्नगी का
    मैं उस को ज़हर लगता हूँ सो पीता ही नहीं है
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    जब मेरे ऐब नज़र ही नहीं आते है मुझे
    ख़ूबियाँ तेरी मुझे ख़ाक नज़र आएँगी?
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    फिर से अरमान कोई क़त्ल हुआ है मेरा
    अश्क आए हैं मेरे ग़ुस्ल-ए-जनाज़ा करने
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    अना का बोझ लिए सर पे घूमता हूँ मैं
    इसे उतारना आसान क्यूँ नहीं होता
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    सब खड़े सुब्ह-ओ-शाम हम तो नहीं
    उन के दर के ग़ुलाम हम तो नहीं

    आप क्यूँ ला-क़लाम हैं हम सेे
    आपसे हम-क़लाम हम तो नहीं

    हम को भी दी ज़बान रब ने, मगर
    आपसे बे-लगाम हम तो नहीं

    मय-कदे में ज़रूर बैठे हैं
    पर तलबगार-ए-जाम हम तो नहीं

    दाद-ओ-तहसीन आप की पाएँ
    ऐसे भी ख़ुश-क़लाम हम तो नहीं

    ओक से मय पियें तेरी साक़ी
    इतने भी तिश्ना-काम हम तो नहीं

    क़ाबिले-एहतराम आप हैं बस
    क़ाबिले-एहतराम हम तो नहीं

    हम कोई ख़ास तो नहीं हैं 'अनीस'
    लेकिन इतने भी आम हम तो नहीं
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    सब जिसे माहताब कहते हैं
    तेरे रुख़ का शबाब कहते हैं

    बर्ग-ए-गुल सी है नाज़ुकी उन की
    हम लबों को गुलाब कहते हैं

    लोग आँखों से पी बहकते हैं
    चश्म जाम-ए-शराब कहते हैं

    गेसुओं से टपकती बूंदों को
    अब्र से गिरता आब कहते हैं

    तेरी पाज़ेब की हुई रुनझुन
    बज रहा जि
    यूँँ रबाब कहते हैं

    दूर हो कर भी पास लगती हो
    क्या इसी को सराब कहते हैं

    पढ़ सकोगे 'अनीस' चेहरे को
    लोग इस को किताब कहते है
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    Anis shah anis
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    हाथ मेरे हैं बंधे हाथ मिलाऊँ कैसे
    पास हो कर भी तेरे पास मैं आऊँ कैसे

    मेरे अंदर भी मचलता है समुंदर लेकिन
    तेरे होंटों की अभी प्यास बुझाऊँ कैसे

    वक़्त ने डाल दी ज़ंजीर मेरे पैरों में
    दौड़ कर तुझ को गले यार लगाऊँ कैसे

    ज़हर-आलूदा मेरे हाथ हुए हैं हमदम
    प्यार का जाम भला तुझ को पिलाऊँ कैसे

    वक़्त कम और मेरे सामने ये लम्बा सफ़र
    तेरी ज़ुल्फ़ों में हसीं शाम बिताऊँ कैसे

    सामने रहती है महबूब की सूरत मेरे
    या-ख़ुदा सज्दे में सर अपना झुकाऊँ कैसे

    बोझ सर पर है फ़राएज़ का 'अनीस' अब मेरे
    फिर बता सर पे तेरे नाज़ उठाऊँ कैसे
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    Anis shah anis
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