समय हाथों से निकला जा रहा है
    परिंदा वक़्त का समझा रहा है

    मुसाफ़िर की तरह हम सब यहाँ हैं
    कोई आया तो कोई जा रहा है

    अभी भी वक़्त है यारो सँभलिए
    समय अब आईना दिखला रहा है

    जहाँ इंसान भी गायब मिलेगा
    अभी बस वो ज़माना आ रहा है

    जरा सोचो कि ईमाँ जब न होगा
    अभी तो आदमी इतरा रहा है

    सलीक़े से हमें रहना ही होगा
    भले मौसम हमें भटका रहा है

    'धरम' अब तो बुराई छोड़ भी दे
    जो दानिशमंद है समझा रहा है
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    Dharamraj deshraj
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    रेत को मुट्ठी में भर कर तय करें मीलों सफ़र
    इस तरह ख़ुशियाँ पहुँचती हैँ यहाँ आवाम तक
    Dharamraj deshraj
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    हम ने सलाम अर्ज़ कहा अपने यार से
    वो राम-राम कहके गले से लिपट गया
    Dharamraj deshraj
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    किस ने दिया है दर्द हमें कुछ पता नहीं
    इतना पता है दर्द हमारा है हिचकियाँ
    Dharamraj deshraj
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    दोस्ती की अभी अभी उन सेे
    ज़ख़्म हम को अभी से मिलते हैं
    Dharamraj deshraj
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    जिस के सीने में मुहब्बत का ख़ज़ाना होगा
    ऐसे इंसान की ठोकर में ज़माना होगा।
    Dharamraj deshraj
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    दर्द सीने में पालकर रखना
    शर्त पहली है शा'इरी के लिए
    Dharamraj deshraj
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    कर के बुलन्द हौसला निकले जो घर से हम
    काँटों ने छोड़ा रास्ता गुज़रे जिधर से हम
    Dharamraj deshraj
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    क्या बात हो गई है जो शरमा रहे हो तुम
    बतला भी दो कि रात में देखा है ख़्वाब क्या
    Dharamraj deshraj
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    ऐ चाँद बादलों से निकल आ तो सामने
    लेंगे हज़ार मर्तबा बोसे नज़र से हम
    Dharamraj deshraj
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