Gulfam Ajmeri

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    हमें तो ज़िंदगी से भी निभाना था
    जो अब तक याद है उस को भुलाना था

    तू ने बस पैरहन ही बदला है सय्याद
    परिंदों से क़फ़स भी तो छुपाना था

    घुमाता ही रहेगा चाक पर मुझ को
    मिरा अब कुछ तो कूज़ा-गर बनाना था
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    अगर दिल जो किसी का ताज़ा टूटे
    कोई आवाज़ दे तो सपना टूटे

    बनाए रखना दूरी बज़्म में आप
    न जाने ज़ेहन का कब शीशा टूटे

    नहीं भर सकता फिर वो ज़ख़्म कोई
    अगर जो वक़्त पहले टाँका टूटे

    कोई कैसे मिरे दुख जान पाए ?
    कोई तो हो जो मेरे जैसा टूटे

    मुहब्बत अब नहीं करनी हमें यार
    कोई टूटे भी तो फिर कितना टूटे

    मिरी माँ का तू भी तो दर्द समझे
    मोहब्बत में तिरा भी लड़का टूटे
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    यार तुम भी कमाल करते हो
    इश्क़ कर के ये हाल करते हो

    अपने ही हाथों हम हुए बर्बाद
    आप फिर क्यूँँ मलाल करते हो
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    गिला कुछ भी नहीं है मौत से मुझ को पर
    ख़ुदा लेने अगर आया तो जाऊँगा मैं
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    मुहब्बत से पहले हमारी मुहब्बत के चर्चे हो जाना
    बड़ी आम सी बात है इस मुहब्बत में झगड़े हो जाना

    चला जाऊँ मैं भी अगर छोड़ कर तुम को तन्हा कहीं पे
    तुम्हारा भी बनता है तुम भी किसी दूसरे के हो जाना

    पिता जी के कहने पे उस लड़की ने बात तो मान ली माँ
    ये तो छोटी सी बात है ख़ुद-कुशी जैसे क़िस्से हो जाना
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    मुझे पहली सफ़ में खड़ा करते थे
    अजब लोग दिल में रहा करते थे

    उसे हम जकड़ लेते थे बाहों में
    बड़ी देर से फिर रिहा करते थे

    वो भी लोग तन्हा हमें कर गए
    वो जो जौन तक को पढ़ा करते थे

    वो लड़की मुझे जब छुआ करती थी
    अलग ही नशे में हुआ करते थे
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    किसी का अगर दिल दुखाए हुए हो
    नज़र का भी जादू चलाए हुए हो

    तुम्हारे भी चेहरे से मुझ को लगा है
    मुहब्बत के तुम भी सताए हुए हो

    बता जाने का दूसरा कोई क़िस्सा
    कहानी ये तो तुम सुनाए हुए हो
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    तुम ख़ुदा ख़ुद को अगर जो मानते हो
    हिज्र में मर जाने का ग़म जानते हो ?

    मैं वहीं हूँ जो तुम्हारे साथ रोया
    तुम तो हम को अब कहा पहचानते हो

    जब था ज़िंदा तो नहीं ली आपने सुद
    बैठ के अब कैसे मिट्टी छानते हो ?
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    सब पूछते हैं इस उदासी का सबब
    रो देते हैं लेकिन उगलते कुछ नहीं
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    जब हाथ उस का पकड़ा तो कहने लगी
    मेरी सुनो शादी से पहले कुछ नहीं
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