वो कहानी मुँहजुबानी याद अब तक है हमें
    जो हमारे होंठ पर थे होठ रख तुम ने कहें
    Subrat Tripathi
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    ख़ुदा की दी हुई नेमत लकीरें हाथ में सब है
    तुम्हीं को छोड़कर के बस हमारे साथ में सब है

    कहे थे हाथ मेरे देख कर के इक नज़ूमी ने
    कि मेरे भाग्य में कुछ भी नहीं पर हाथ में सब है
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    नज़र से दूर होते जा रहे हो
    बहुत मशहूर होते जा रहे हो

    फ़क़त दिन चार की है ज़िन्दगी ये
    मगर रंजूर रहते जा रहे हो

    बिछड़ के शा'इरी हो लिख रहे तुम
    मिरा मज़कूर होते जा रहे हो

    तुझे ही याद करता हूँ सदा मैं
    मिरा सिंदूर होते जा रहे हो

    नज़र आते नहीं दुनिया जहाँ में
    फ़लक का हूर होते जा रहे हो
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    Subrat Tripathi
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    क़स
    में तुम तो नहीं खाती थी
    फिर भी तुम ने छोड़ दिया था
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    किए थे पाप जितने भी बुरे सदक़ा उतारा था
    हज़ारों मुश्किलों की जद में रिश्ता हमारा था

    गिरे थे भाव सोंनें और चाँदी के मिनट भर में
    उसनें जब भरी बाज़ार में झुमका उतारा था
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    Subrat Tripathi
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    सब को ऐसे क्यूँ तकती हो
    सबके दिल में क्यूँ रहती हो
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    करतब का सब काम वो बंदर करता है
    पर सबकी नज़रें कारीगर पर होती हैं
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    देखो चाँद की ज़िद मत करना पागल हो
    ऐसी बातें फिल्मों में ही होती हैं
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    हिज्र से तंग आके मैं ने तस्वीर उस की तोड़ दी
    छिपकली भी देख कर ये दर्द मेरा रो पड़ी
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    एक हमीं तेरे अपने हैं, बाकी सब बेगाने है
    एक हमीं में पागलपन है, बाकी सब दीवाने है
    Subrat Tripathi
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