बला की ख़ूब-सूरत इक कली से
मुहब्बत हो गई हम को किसी से
सभी थे याद करते काम से, सो
किनारा कर लिया हम ने सभी से
लड़ी थी इक दफ़ा जब आँख तुम से
मैं तुम को चाहता हूँ, बस तभी से
लड़ेंगे मौत तुझ से आख़िरी दम
नहीं हम हारने वाले अभी से
बताऊँ क्या भला रिश्ता हमारा
वही जो मछली का है हर नदी से
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