आदत मिरी कितनी बुरी बन जाती है
जब शा'इरी ही ज़िन्दगी बन जाती है
आ जाऊँ महबूबा के मैं जो सामने
वो देख मुझ को अजनबी बन जाती है
रोता बिलखता देख कर बच्चों को माँ
फिर छोड़ घूँघट आदमी बन जाती है
मछली जो इक आ जाए उन के जाल में
नाख़ुश मछेरों की ख़ुशी बन जाती है
बुझने लगे जब इश्क़ की वो ज्योति तो
माँ की मोहब्बत रौशनी बन जाती है
आ कर 'अलौकिक' नइँ मिले फ़ुर्सत से जो
फ़ुर्सत का होना बेक़सी बन जाती है
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