Naaz ishq

Top 10 of Naaz ishq

    ऐ उदास लड़की
    जहाॅं से रूठी हुई ऐ उदास लड़की तुझे
    ख़बर नहीं तिरा हुस्न ओ जमाल ढल रहा है
    कई बरस से बदन पे वही दरीदा लिबास
    तेरा ये चेहरा मगर पैरहन बदल रहा है

    निगाह से नज़र आता है मुंतज़िर है तू
    लबों पे वज़्न-ए-गोहर गर्द-ए-राह ख़्यालों पर
    अगर कभी कोई जो गुफ़्तगू करे तुम सेे
    तो होगी इब्तिदा और इंतिहा सवालों पर

    तेरे मिज़ाज में ये ख़ामोशी न थी पहले
    मैं जानता हूँ कि इस का तवील सिलसिला है
    तमाशबीन कोई भी क़यास कर लेगा
    ये कम सुख़न किसी ग़म में ज़रूर मुब्तिला है

    उमीद-ए-यार में बुझती हुई ये चश्म-ए-तर
    इसी गुमान में तू कब तलक जलाएगी
    भुला के दहर तू जिन साअ'तों में खोई है
    न कट सकेंगी मगर उम्र बीत जाएगी

    सराब-ए-नक़्श इस उम्मीद के मिटा दो तुम
    मैं शहर-ए-ख़्वाब के ख़ाकों में रंग भर दूँगा
    मैं जानता हूँ कि मुश्किल है पर तू मेरी तरफ़
    क़दम बढ़ा मैं तुम्हें फिर हसीन कर दूँगा
    Read Full
    Naaz ishq
    10
    6 Likes
    रू-ब-रू भी न तू और ओझल नहीं
    याद आती है लेकिन मुसलसल नहीं

    क्या त'अल्लुक बढ़ाऊॅं मुझे इल्म है
    आज वो शख़्स होगा मगर कल नहीं

    उस की शादी थी कल रात को और आज
    सुब्ह से मेरे कमरे में हल-चल नहीं

    मेरे अल्फ़ाज़ में यूँॅं ही आतिश न है
    दोस्त काफ़ी तपा हूँ मैं सो जल नहीं

    अज्नबिय्यत हो या दोस्ती हो कि इश्क़
    तुझ से कोई त'अल्लुक मुकम्मल नहीं

    दश्त-ए-इमकाँ में हम चल पड़े थे मगर
    धूप ही धूप है कोई बादल नहीं

    पड़ गई सिलवटें आज बिस्तर पे 'नाज़'
    आज उस की जबीं पे कोई बल नहीं
    Read Full
    Naaz ishq
    4 Likes
    जिस दिन मेरे कहने पर था घर से भागा वो
    मैं भी डरा हुआ था उस दिन सहमा सहमा वो

    जब तक इल्म मुझे हो पाया उस से मोहब्बत का
    तब तक तो मुझ सेे काफ़ी दूर जा चुका था वो

    इज़्ज़त थी मेरी पर सिक्का उस का चलता था
    नोट था मैं दो हज़ार का और सौ दो सौ का वो

    पास में घर होना भी जैसे भारी दिक़्क़त थी
    कभी भी मिलने आ जाता था चलता फिरता वो

    है मुंतज़िर रखा उस ने जितना तुम को अब तक
    मुझ से शर्त लगा ले 'नाज़' नहीं आएगा वो
    Read Full
    Naaz ishq
    4 Likes
    कल रात भी हमारी कटी दम-ब-दम उदास
    दिन भी अभी शुरू हुआ है और हम उदास 

    मैं ख़ुद-कुशी की रेल में बैठा ख़ुशी ख़ुशी
    मैं जाते जाते कर गया हूँ सारे ग़म उदास

    जितना मैं तुम सेे दूर हुआ उतना ख़ुद के पास 
    सो हर क़दम मैं ख़ुश हुआ हूँ हर क़दम उदास

    दुनिया में अस्ल में कोई भी ख़ुश नहीं है दोस्त 
    कोई उदास ज़्यादा है तो कोई कम उदास

    समझो किसी के साथ मेरी शादी हो गई 
    समझो कि उस के कट गए सातों जनम उदास

    गर छोड़ कर नहीं गया तुम को कोई कभी 
    तो किस सबब से 'नाज़' फिर इतनी रक़म उदास
    Read Full
    Naaz ishq
    3 Likes
    "तशवीश"
    मुझ को ये डर है कि शायद
    ये सब कुछ सच हो जाएगा
    आज का दिन निकला है जैसे
    यूँँॅं कल का भी निकल जाएगा
    फिर धीरे-धीरे क्या होगा

    मेरी सालों की मेहनत पर
    ये क़िस्मत पानी फेरेगी
    मैं अल्हड़-पन से निकलूॅंगा
    और ज़िम्मेदारी घेरेगी
    कॉलेज ख़त्म हो जाएगा
    फिर नौकरी करूँॅंगा मैं
    और दस पंद्रह हज़ार के ख़ातिर
    दिन और रात मरूॅंगा मैं

    दिन दफ़्तर में जाएगा और रात ख़यालों में जाएगी
    फिर इस सोच में दिन निकलेंगे अपनी बारी आएगी

    मगर नहीं आएगी
    इक इतवार ज़रूर आएगा
    छह दिन बा'द कहीं जा कर के
    एक महीने की तनख़्वाह
    इक हफ़्ते में ख़त्म
    फिर दूर-दूर तक नहीं दिखेंगे
    नाज़ ग़ज़ल और नज़्म
    शौक़ दबाता जाऊॅंगा
    फ़र्ज़ निभाता जाऊॅंगा
    फिर धीरे-धीरे क्या होगा

    शादी की बातें होंगी
    दिन दफ़्तर में जाएगा
    साथ किसी के रातें होंगी
    जो शाख-ए-उम्मीद पकड़ के बैठा हूँ
    ये भी इक दिन जल जाएगी
    फिर धीरे-धीरे क्या होगा

    नाज़ जवानी ढल जाएगी
    मुझ को कुछ करना था
    मुझ को कुछ बनना था
    मगर नहीं कर पाया मैं

    बाक़ी सब तो कर लेंगे कुछ
    अपना ही रह जाएगा
    ये दुनिया घूमने का सपना
    सपना ही रह जाएगा
    फिर हर रोज़ पशेमाँ हो के
    मैं बीती बातें सोचूॅंगा
    और ख़ुद को कोसूॅंगा

    ये भी किया जा सकता था
    वो भी किया जा सकता था
    यूँँॅं ज़िन्दगी गुज़ार दी है
    खुल के जिया जा सकता था
    और फिर अपनी नज़्म पढूॅंगा
    उम्र निकलती जाएगी
    मौत का ख़ौफ़ रहेगा
    फिर धीरे-धीरे क्या होगा

    इक दिन इन सब से तंग आके
    मैं शायद ख़ुद-कुशी करूँॅंगा
    शे'र लिखा होगा दीवार-ओ-दर पर
    एक बहुत अच्छा सा

    लगता है हर रोज़ यही
    इक ऐसा दिन भी आएगा
    मुझ को ये डर है कि शायद
    ये सब कुछ सच हो जाएगा
    Read Full
    Naaz ishq
    6
    7 Likes
    "फ़ैज़"
    मुझे तुम छोड़ कर फिर से न जाना
    दोबारा मैं तुम्हें अपना रहा हूँ
    पुरानी मैं सभी बातें भुला दूँगा
    तुम्हें सब याद है या फिर नहीं है क्या पता लेकिन
    मुझे सब याद है मैं ने यही सब कुछ कहा था
    मगर तुम ने किया क्या जो तुम्हें करना था

    तुम उस बरसात के जैसी हो
    हमेशा जो ग़लत मिक़दार में होती है
    कभी ज़्यादा कभी कम और बे-मौसम
    फ़क़त मिट्टी भिगोने के लिए

    न जाने अब मुझे क्या हो गया है
    फ़ज़ाओ में कहानी सी नज़र आती है अब
    हर इक वो चीज़ जो मैं देखता हूँ
    हमारी ही कहानी लगती है सब , वो नदी देखो
    तुम्हें लगता नहीं मैं वो नदी हूँ और वो बादल तुम

    नदी सूखी हुई बादल भरे
    नदी है मुंतज़िर बरसात की
    मगर बादल गुज़र जाएगे
    दोबारा लौट कर आएगे
    मगर फिर से वही होगा

    यही होता है मेरे साथ भी हर बार

    भॅंवर हूँ मैं किनारे तुम
    ख़ला हूँ मैं नज़ारे तुम
    मैं हूँ पतझड़ बहारें तुम
    तुम्हारा मैं हमारे तुम
    नहीं ऐसा नहीं है
    अलग है हम बहुत
    तुम्हें मैं बे सबब ही याद करता रहता हूँ
    तुम्हारे पास जब कोई नहीं होता वहॉं मैं

    नफ़ा हो तुम ख़सारा मैं
    तुम्हीं हो चाँद तारा मैं
    मोहब्बत और कोई है
    गुज़ारा मैं
    दोबारा पास आओगी तुम
    सहेगा कौन
    दोबारा मैं
    सदाए दूँगा तुम को मैं पुकारूॅंगा मगर
    मेरी ये इल्तिज़ा है तुम सेे
    मत आना लौट कर
    Read Full
    Naaz ishq
    5
    5 Likes
    विसाल-ओ-हिज्र तो जीवन में ऐसा था कि लगता है
    तुम्हें मेरे मुक़द्दर में लिखा लिख के मिटाया है

    समझता है यही वो भी यही मैं भी समझता हूँ
    मैं उस को याद करता हूँ वो मुझ को याद करता है

    तेरे होते भी सब को मेरी जानिब खींच लूँगा मैं
    तिरी आँखों से मेरे ज़ख़्मों में गहराई ज़्यादा है

    कभी में'आर तक तुम तो हमारे आ नहीं सकते
    यहीं कहना तुम्हारा था यही कहना हमारा है

    बिछड़ के मुझ सेे वो भी शा'इरी करने लगा है अब
    मैं उस पे शे'र कहता हूँ वो मुझ पे शे'र कहता है
    Read Full
    Naaz ishq
    4 Likes
    मैं ने थोड़ी और हिम्मत करली होती काश उस दिन
    फिर न मुझ को ये बताना पड़ता फिर सब देख लेते
    Naaz ishq
    6 Likes
    हक़ ज़िंदगी पे मेरी भी अब मेरा नहीं है
    अब ख़ुद-कुशी अगर की तो चार जन मरेंगे
    Naaz ishq
    6 Likes
    अगर हटती निगाहें उस के चेहरे से
    मैं साड़ी पहनी तो तब देखता उस की
    Naaz ishq
    6 Likes

Top 10 of Similar Writers