Milan Gautam

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    सालिम पनाहें कोई छोड़ेगा क्यूँँ मगर हम
    लाचार हो के तेरी बाँहों से आज निकले
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    हाथों को जोड़कर मैं उसे माँग लेता हूँ
    तारे जब आसमान के चक्कर लगाते हैं
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    आशिक़ों के सीनों में होने चाहिए दो दिल
    एक हो ही जाता है ज़ाया' टूट जाने में
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    पहली बात किसी से प्यार नहीं करना
    हो जाए तो फिर इनकार नहीं करना
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    मैं सारा बाग़ दे रहा हूँ तोहफ़े में तुम्हें
    अगर नहीं रहा मैं साथ तो रहेंगे फूल
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    सहराओं से उत्कट रवानी की तरफ़
    मैं चल दिया हूँ आज पानी की तरफ़

    हाथों से बजरी सा फिसलता जा रहा
    है बढ़ रहा बचपन जवानी की तरफ़

    ये उम्र ही तो है मोहब्बत करने की
    मैं जा रहा हूँ इक दिवानी की तरफ़

    दौलत की जिस-जिस को भी ताक़त मिल गई
    वो बढ़ रहा है हुक्मरानी की तरफ़

    हम इम्तिहाँ भी ले चुके हैं उस का और
    अब बढ़ना होगा जावेदानी की तरफ़

    अब मुल्क में ग़ुर्बत भी छाने वाली है
    है ही नहीं कोई किसानी की तरफ़

    इंसानियत का मरना तो ज़ाहिर ही है
    सब जा रहे हैं बद-गुमानी की तरफ़

    जो सुन के दिल महसूस कर पाए चलो
    इक ऐसी ही अफ़ज़ल कहानी की तरफ़
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    जब से उन से दुआ-सलाम हो गया
    मेरी ख़ल्वत का इंतिज़ाम हो गया

    मुझ से कहता था दिल वफ़ा निभाऊँगा
    अब किसी और का ग़ुलाम हो गया

    जो हमारी नमक-हलाली करता था
    आज वो ही नमक-हराम हो गया

    पहले आती थी याद वो कभी-कभी
    सिलसिला अब ये सुब्ह-ओ-शाम हो गया

    मैं मोहब्बत में सरफ़राज़ था कभी
    बैर कर के मैं शख़्स-ए-आम हो गया

    हार कर इश्क़ में हयात बार-बार
    मिस्ल-ए-फ़रहाद-ओ-क़ैस नाम हो गया

    पहले तो दुनिया में मिरा कोई न था
    फिर 'मिलन' आलम-ए-तमाम हो गया
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    दिलबर-ओ-दिलदार में काफ़ी फ़र्क़ है
    जैसे इश्क़ और प्यार में काफ़ी फ़र्क़ है

    लड़कियाँ आँखों से ही कर सकती हैं क़त्ल
    हुस्न और तलवार में काफ़ी फ़र्क़ है
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    इश्क़ उस से ही करूँँगा मेरे मर जाने तक
    वो मेरा हो या न हो उम्र गुज़र जाने तक
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    रईसों के गले में मोतियों का नूर-पाश है
    नसीब सीपों के लिखा गया ये सर्वनाश है

    समंदरों को भान है सुनामी कब कहाँ उठे
    सुनामी उठ गई अगर विनाश ही विनाश है

    भरोसे का मकान कच्ची ईंटों से बना हुआ
    हवा से हिल गया बिख़र गया तो पाश-पाश है

    जहाँ मसर्रतों की बारिशें कभी नहीं हुईं
    वहाँ का आम आदमी भी हो चुका हताश है

    यहाँ किसी भी बद-म'आश के लिए जगह नहीं
    हमारा मीर ही लुटेरा और ख़ुश-म'आश है

    खुशामदें यहाँ के हुक्मरानों को हैं चाहिए
    यहाँ का नेक-दिल हबी भी साहिब-ए-फ़िराश है

    न जाने कब से आ रहा चला रिवाज़-ए-कत्ल है
    न जाने कब ये बन गया रिआया का म'आश है

    यहाँ की धूप जानलेवा होती जा रही 'मिलन'
    हमें किसी अनोखे से दरख़्त की तलाश है
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    Milan Gautam
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