Pritam sihag

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    संसार को बेहद ज़ालिम जान लिया मैं ने
    फिर उस सेे मिला हाथों को चूम दिया मैं ने

    जो उस ने किताब-ए-ग़म तोहफ़े में मुझे दी थी
    इक पन्ना ये याद-ए-रफ़्ता चूम लिया मैं ने
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    एक और वा'दा उस ने किया मोहब्बत का
    पिछले साल भी ऐसे वादे से वो मुकरी थी
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    यूँँ तो लिख लूँगा अपने आप ही मेरी कहानी मैं
    हो इन में नाम गर अपनों के भी शामिल तो क्या होता
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    यूँँ ही नहीं लगाया सिगरेट को लबों से
    मैं उस की सारी यादें सुलगाना चाहता हूँ
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    बुरे हालात है तो क्या हुआ इंसान अच्छा हूँ
    सभी रहते यहाँ मुझ सेे खफ़ा इंसान अच्छा हूँ

    ये मेरी जेब में जब तक अमीरी की निशानी थी
    मुझे सारा ज़माना कहता था , इंसान अच्छा हूँ

    मैं तेरी बे-वफ़ाई के सभी क़िस्सों से वाक़िफ़ हूँ
    मैं ने फिर भी रखी तुम सेे वफ़ा ,इंसान अच्छा हूँ
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    ये तुम रोज़ किस दरिया में बह रहे हो
    ये दिल ख़ाली है, तुम कहाँ रह रहे हो

    ये मैं हूँ कि ग़म में लिखे जा रहा हूँ
    वो कहते हैं अच्छी ग़ज़ल कह रहे हो
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    अरे ख़ुद-कुशी करने वाले ज़रा रुक
    वतन पर मरो ऐसे क्या मर रहे हो
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    ये कहानी झूठी है ,पर सच्चा मैं किरदार हूँ
    यूँँ ख़फ़ा मत हो तू ,मैं तेरे बिना बे-कार हूँ

    ए मोहब्बत के समुंदर मुझ को ले डूबेगा तू
    कश्ती भी उस की हुई ,ऊपर से बे-पतवार हूँ
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    "चाय"
    तेरे मेरे मिलन की बात कुछ ऐसी है
    थकान और चाय के कप जैसी है
    जब भी ज़िन्दगी से थक हार जाऊँ मैं
    अपनी बाहों में जगह देना मुझ को
    और जब जाने की जिद करुँ तो
    एक कप चाय और बना देना मुझ को
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    ये सोचा था ग़रीबी को किताबों से मिटाऊँगा
    न था मालूम मैं भूखा किताबें ही खा जाऊँगा

    मिरे कंधों पे घर का बोझ आता जा रहा है अब
    मैं अब ख़्वाबों को बाहर का ही रास्ता तो दिखाऊंँगा
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