Siddharth Saaz

Top 10 of Siddharth Saaz

    कभी तो कोसते होंगे सफ़र को
    कभी जब याद करते होंगे घर को

    निकल पड़ती हैं औलादें कमाने
    परिंदे खोल ही लेते हैं पर को
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    हम ने तुझ पे छोड़ दिया है
    कश्ती, दरिया, भँवर, किनारा
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    उसी वक़्त अपने क़दम मोड़ लेना
    नदी पार से जब इशारा करूँँगा
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    हर तरफ़ उग आए हैं जंगल हमारी हार के
    जीत का कोई भी रस्ता अब नहीं दिखता हमें
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    ग़ज़ल पूरी न हो चाहे, मग़र इतनी सी ख़्वाहिश है
    मुझे इक शे'र कहना है तेरे रुख़्सार की ख़ातिर
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    `तू मेरे पास आ कर बैठ मुझ सेे बात कर ऐ दोस्त
    ये मुमकिन है कोई दरिया ख़राबों से निकल आए
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    एक नया आशिक़ है उस का, जान छिड़कता है उसपर
    मुझ को डर है वो भी इक दिन मय-ख़ाने से निकलेगा
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    जब से तू ने ये बोला था "बदन का क्या है मिट्टी है"
    तब से तेरी पीठ पे मुझ को हरसिंगार उगाने थे
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    तेरे होंठो से गर इक काम लेना हो
    तेरे होंठो से हम बस इक दुआ लेंगे
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    जबकि मैं ने इश्क़ में मरने का वा'दा कर लिया
    तब लगा मुझ को कि मैं ने इश्क़ ज़्यादा कर लिया
    Siddharth Saaz
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