Sandeep Thakur

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    ज़िंदगी इक फ़िल्म है मिलना बिछड़ना सीन हैं
    आँख के आँसू तिरे किरदार की तौहीन हैं
    Sandeep Thakur
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    ज़िंदगी इक फ़िल्म है मिलना बिछड़ना सीन हैं
    आँख के आँसू तिरे किरदार की तौहीन हैं

    एक ही मौसम वही मंज़र खटकने लगता है
    सच ये है हम आदतन बदलाव के शौक़ीन हैं

    नींद में पलकों से मेरी रंग छलके रात भर
    आँख में हैं तितलियाँ तो ख़्वाब भी रंगीन हैं

    राह तकती रात का ये रंग है तेरे बिना
    चाँद भी मायूस है तारे भी सब ग़मगीन हैं

    उँगलियों पे गिन मिरी तन्हाइयों के हम सफ़र
    इक उदासी जाम दूजा याद तेरी तीन हैं

    क़ाएदे से कब जिया है ज़िंदगी मैं ने तुझे
    मैं तिरा मुजरिम हूँ मेरे जुर्म तो संगीन हैं

    ख़ुशनुमा माहौल था कल तक थिरकते थे सभी
    आज आख़िर क्या हुआ है लोग क्यूँ ग़मगीन हैं
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    'उदासी'
    इबारत जो उदासी ने लिखी है
    बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है
    किसी की पास आती आहटों से
    उदासी और गहरी हो चली है
    उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब
    समुंदर की उदासी टूटती है
    उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो
    मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है
    मिरे घर की घनी तारीकियों में
    उदासी बल्ब सी जलती रही है
    उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली
    न जाने किस का रस्ता देखती है
    उदासी सुब्ह का मासूम झरना
    उदासी शाम की बहती नदी है
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    जाम सिगरेट कश और बस
    कुछ धुआँ आख़िरश और बस

    मौत तक ज़िंदगी का सफ़र
    रात-दिन कश्मकश और बस

    पी गया पेड़ आँधी मगर
    गिर पड़ा खा के ग़श और बस

    ज़िंदगी जलती सिगरेट है
    सिर्फ़ दो-चार कश और बस

    सूखते पेड़ की लकड़ियाँ
    आख़िरी पेशकश और बस
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    Sandeep Thakur
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    बेवजह मुझ सेे फिर ख़फ़ा क्यूँ है
    ये कहानी ही हर दफ़ा क्यूँ है

    कुछ भी मजबूरी तो नहीं दिखती
    मैं क्या जानूं वो बे-वफ़ा क्यूँ है
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    Sandeep Thakur
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    ख़्बाब आँखों में बंद कर लेते
    बात गर दिल की चंद कर लेते

    आप भी हो ही जाते दीवाने
    गर किसी को पसंद कर लेते
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    Sandeep Thakur
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    तू मिला ही नहीं मगर फिर भी
    है बिछड़ने का मुझ को डर फिर भी

    जानता हूँ तू आ नहीं सकता
    पर सजाया है मैं ने घर फिर भी
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    Sandeep Thakur
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    दिल के दरवाज़े भेड़ कर देखो
    जख़्म सारे उधेड़ कर देखो

    बंद कमरे में आईने से कभी
    तुम मेरा जिक्र छेड़ कर देखो
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    Sandeep Thakur
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    आज पलटे जो ख़्बाब के पन्ने
    मैं ने दिल की किताब के पन्ने

    वक़्त ने देख मोड़ रक्खे हैं
    तेरे हुस्नो शबाब के पन्ने
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    Sandeep Thakur
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    रूठा था मैं बहुत दिनों से मान गया लेकिन
    कान पकड़ कर जब वो बोली सोरी-वोरी सब
    Sandeep Thakur
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